यम का दीपक कैसे जलाएं: अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाता है धनतेरस पर यम दीपदान

यम का दीपक कैसे जलाएं: अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाता है धनतेरस पर यम दीपदान

नई दिल्ली: सनातन हिंदू धर्म में पांच दिवसीय दीपोत्सव के पहले दिन यानी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (धनतेरस) की संध्या को यमराज के निमित्त दीपदान करने का विधान सदियों से चला आ रहा है। सामान्य तौर पर लोग धनतेरस को केवल भगवान धन्वंतरि, कुबेर देव और माता लक्ष्मी की पूजा और सोने-चांदी के आभूषणों व बर्तनों की खरीदारी का पर्व मानते हैं, लेकिन धर्मग्रंथों में इस दिन किए जाने वाले 'यम दीपदान' को परिवार के जीवन और सुरक्षा के दृष्टिकोण से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि धनतेरस की रात जो गृहस्थ श्रद्धापूर्वक यमराज के लिए दीपदान करता है, उसके घर में अकाल मृत्यु (असामयिक निधन), गंभीर दुर्घटनाओं और असाध्य रोगों का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। यमराज मृत्यु और न्याय के देवता हैं, और वर्ष में केवल यही एक ऐसा दिन होता है जब उनकी विशेष पूजा और दीपदान से उन्हें संतुष्ट कर परिवार की लंबी आयु का वरदान प्राप्त किया जाता है। हालांकि, यम का दीपक जलाने के नियम अन्य सभी पूजा के दीपकों से पूरी तरह भिन्न होते हैं; यदि इसे गलत समय, गलत दिशा या गलत स्थान पर जलाया जाए, तो इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ सकता है। इसलिए प्रत्येक श्रद्धालु को यह जानना अनिवार्य है कि यम का दीपक कब, कहां, किस विधि से और किस दिशा में प्रज्वलित किया जाना चाहिए।

यम का दीपक कब जलाएं: जानिए प्रदोष काल का सबसे सटीक समय और परंपरा

पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, यमराज के निमित्त दीपदान केवल कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी यानी धनतेरस की शाम को ही किया जाता है। कई जगहों पर नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) की रात भी यम का दीया जलाने की परंपरा है, लेकिन मुख्य दीपदान धनतेरस की रात को ही माना गया है। इस दीपक को प्रज्वलित करने का सबसे उपयुक्त समय सूर्यास्त के बाद का 'प्रदोष काल' होता है, जब चारों तरफ अंधकार फैलने लगता है। इसके साथ ही सबसे अनिवार्य नियम यह है कि यम का दीपक तब जलाया जाना चाहिए जब घर के सभी सदस्य अपने काम-काज या दफ्तर से घर लौट चुके हों और बाहर जाने का कोई काम शेष न बचा हो। घर के भीतर की सामान्य पूजा-अर्चना और भगवान धन्वंतरि की आरती संपन्न होने के बाद, रात को सोने से ठीक पहले या परिवार के सभी सदस्यों के भोजन करने के बाद इस दीये को प्रज्वलित करने का विधान है। मान्यता है कि यम का दीपक जलने के बाद परिवार का कोई भी सदस्य रात में घर की दहलीज लांघकर बाहर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि यह दीपक नकारात्मक शक्तियों और मृत्यु के दूतों को घर से दूर रखने के लिए दहलीज पर स्थापित किया जाता है।

यम का दीपक किस धातु या सामग्री का होना चाहिए: मिट्टी या आटे का चौमुखा दीया?

शास्त्रों के अनुसार, यम का दीपक कभी भी एक बाती वाला या साधारण मिट्टी का दीया नहीं होना चाहिए। यमराज के लिए सदैव 'चौमुखा दीपक' (चार मुखों और चार बत्तियों वाला) जलाया जाता है, जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है। इस दीपक के निर्माण के लिए गूंथे हुए गेहूं के आटे का चौमुखा दीया बनाना सबसे उत्तम और शुभ माना जाता है। यदि आप आटे का दीपक बना रहे हैं, तो उसमें थोड़ा सा काला तिल भी मिला सकते हैं। यदि किसी कारणवश आटे का दीपक बनाना संभव न हो, तो आप बाजार से बड़े आकार का नया मिट्टी का चौमुखा दीया ला सकते हैं। ध्यान रखें कि यह दीया कहीं से भी चटका या टूटा हुआ नहीं होना चाहिए। इस दीपक में सरसों का कड़वा तेल या तिल का तेल ही भरा जाना चाहिए; यम के दीपक में कभी भी शुद्ध गाय के घी का प्रयोग नहीं किया जाता, क्योंकि सरसों का तेल और तिल यमराज तथा शनि देव को अत्यंत प्रिय हैं और यह नकारात्मक ऊर्जा का नाश करते हैं। बत्ती के रूप में रुई की दो लंबी बत्तियों को एक-दूसरे के ऊपर क्रॉस करके चार मुख बनाए जाते हैं, जिससे दीये के चारों कोनों से लौ प्रज्वलित हो सके।

दीपक में क्या-क्या डालना है: एक सिक्का और कौड़ी का अचूक महत्व

यम का दीपक केवल तेल और बत्ती से नहीं जलाया जाता, बल्कि इसमें कुछ प्रतीकात्मक वस्तुएं डालना अनिवार्य माना गया है। सबसे पहले तैयार किए गए चौमुखा दीपक में सरसों का तेल भरें। इसके बाद उसमें एक साफ तांबे या चांदी का सिक्का (या साधारण एक रुपये का सिक्का) डालें। इसके साथ ही उसमें एक पीली या सफेद कौड़ी, चुटकी भर काले तिल और थोड़ी सी रोली-अक्षत अवश्य डालें। शास्त्रों में सिक्के को ऋणमुक्ति और धन के ठहराव का प्रतीक माना गया है, जबकि काला तिल और कौड़ी नकारात्मक शक्तियों, बुरी नजर और यम के दूतों के प्रभाव को निष्प्रभावी करने के लिए अर्पित किए जाते हैं। जब आप दीपक में सिक्का और कौड़ी डालते हैं, तो यह यमराज के प्रति आपकी श्रद्धा और परिवार की रक्षा के लिए एक आध्यात्मिक भेंट का रूप ले लेता है।

यम का दीपक कहां और किस दिशा में रखें: मुख्य द्वार और दक्षिण दिशा का नियम

स्थान और दिशा का चयन यम दीपदान की सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण कड़ी है। यम का दीपक कभी भी घर के पूजा घर, बेडरूम, रसोई या घर के भीतर नहीं जलाया जाता। इसे सदैव घर की चौखट के बाहर, मुख्य प्रवेश द्वार (मेन गेट) के पास स्थापित किया जाता है। यदि आप किसी बहुमंजिला फ्लैट या अपार्टमेंट में रहते हैं, तो अपने फ्लैट के मुख्य दरवाजे के बाहर इसे रखें। यमराज का वास ब्रह्मांड की दक्षिण दिशा में माना गया है, इसलिए इस दीपक की मुख्य लौ का मुख हमेशा 'दक्षिण दिशा' (South Direction) की ओर होना चाहिए। दीपक को कभी भी सीधे जमीन पर न रखें; शास्त्रों में भूमि पर बिना किसी आसन के दीपक रखना वर्जित माना गया है। जमीन पर पहले थोड़ा सा गेहूं, चावल या काले तिल का आसन (ढेरी) बनाएं, या फिर कोई लकड़ी का पाटा अथवा मिट्टी का खपरैल रखकर उसके ऊपर इस पावन दीपक को स्थापित करें।

यम दीपदान की संपूर्ण स्टेप-बाय-स्टेप विधि: जानिए कैसे करें यह पावन अनुष्ठान

यम का दीपक जलाने की विधि अत्यंत सरल लेकिन कड़े नियमों से बंधी हुई है। घर की सबसे वरिष्ठ महिला या घर का मुखिया स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करे। सबसे पहले घर के मंदिर में सामान्य दीपक जलाकर माता लक्ष्मी और भगवान धन्वंतरि की पूजा कर लें। इसके बाद रसोई या पूजा स्थल के पास आटे का चौमुखा दीया तैयार करें, उसमें सरसों का तेल, चार बत्तियां, सिक्का, कौड़ी और काले तिल डालें। इस दीपक को घर के भीतर ही किसी प्लेट में रखकर प्रज्वलित कर लें। अब इस जलते हुए दीपक को आदरपूर्वक दोनों हाथों में लेकर घर के मुख्य द्वार की ओर जाएं। मुख्य द्वार के बाहर जाकर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके खड़े हों और जमीन पर रखे गए अनाज के आसन पर दीपक को सावधानीपूर्वक रख दें। इसके बाद हाथ में थोड़ा सा जल लेकर दीपक के चारों ओर तीन बार परिक्रमा के रूप में जल छिड़कें (आचमन करें) और हाथ जोड़कर भगवान यमराज से अपने परिवार की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना करें। दीपदान करते समय इस पौराणिक मंत्र का उच्चारण अवश्य करें: "मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥" यदि आपको यह संस्कृत मंत्र याद न हो, तो सरल भाषा में कहें—"हे सूर्यपुत्र यमराज! पाश और दंड धारण करने वाले प्रभु, आप मेरी इस त्रयोदशी की भेंट को स्वीकार करें और मेरे परिवार को अकाल मृत्यु के भय से मुक्त रखें।" प्रार्थना करने के बाद तुरंत पीछे मुड़ जाएं और सीधे घर के अंदर आ जाएं; ध्यान रखें कि दीपक रखने के बाद उसे दोबारा पीछे मुड़कर बिल्कुल न देखें।

यम दीपदान के 5 सबसे सख्त नियम: भूलकर भी न करें ये गलतियां

यमराज के दीपदान के दौरान कुछ कड़े नियमों और सावधानियों का पालन करना अनिवार्य माना जाता है ताकि पूजा का पूर्ण फल मिले: पहला नियम यह है कि दीपक को घर के बाहर रखने के बाद परिवार का कोई भी सदस्य उसे देखने के लिए बार-बार बाहर न झांके और न ही पीछे मुड़कर देखे; सीधे घर के अंदर आकर मुख्य द्वार बंद कर लेना चाहिए। दूसरा नियम यह है कि यम का दीपक रात भर जलना चाहिए, इसलिए उसमें पर्याप्त मात्रा में तेल डालें ताकि वह बीच में ही बुझ न जाए। यदि हवा के कारण दीपक बुझ भी जाए, तो उसे दोबारा जलाने के लिए बाहर न जाएं। तीसरा नियम यह है कि अगली सुबह (छोटी दिवाली के दिन) उस दीपक के अवशेष को सही तरीके से विसर्जित करें। यदि आटे का दीया था, तो सुबह उसे उठाकर किसी पेड़ (जैसे पीपल या बरगद) की जड़ में रख दें या किसी बहते जल में प्रवाहित कर दें, अथवा गाय या पक्षियों को खाने के लिए डाल दें। चौथा नियम यह है कि दीपक के भीतर रखा गया सिक्का किसी भिखारी को दान कर दें या उसे बहते जल में प्रवाहित कर दें; उस सिक्के को कभी भी अपने पर्स में न रखें और न ही घर के खर्च में उपयोग करें। पांचवां नियम यह है कि यम के दीपक की बत्ती को कभी भी घर के किसी सदस्य की ओर न करें, उसकी चारों दिशाओं में जलती लौ में से दक्षिण की ओर की लौ सबसे प्रमुख मानी जाती है।

क्यों शुरू हुई यम दीपदान की परंपरा: राजा हेम और 16 वर्ष के राजकुमार की अमर कथा

यम के दीपदान के पीछे स्कंद पुराण में वर्णित एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक कथा जुड़ी हुई है। प्राचीन काल में राजा हेम नामक एक धर्मात्मा राजा थे, जिन्हें कई वर्षों की तपस्या के बाद एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जब राजा ने राज्य के प्रकांड ज्योतिषियों को अपने पुत्र की कुंडली दिखाई, तो ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि विवाह के ठीक चौथे दिन इस बालक की अकाल मृत्यु हो जाएगी। यह सुनकर राजा और रानी अत्यंत दुखी हो गए और उन्होंने राजकुमार को यमुना तट पर एक सुरक्षित गुफा में एकांतवास में रख दिया ताकि वह किसी स्त्री की छाया से भी दूर रहे। समय बीतता गया और एक दिन राजा हंस की रूपवती कन्या यमुना तट पर आई, जिसे देखकर राजकुमार मोहित हो गया और दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया। विवाह के बाद जब चौथा दिन आया, तो यमराज के यमदूत राजकुमार के प्राण हरने के लिए महल में पहुंचे। अपनी नवविवाहिता पत्नी के सामने जब राजकुमार के प्राण पखेरू उड़ने लगे, तो राजकुमारी का विलाप देखकर कठोर हृदय वाले यमदूतों का कलेजा भी दहल गया और वे रोते हुए खाली हाथ यमराज के दरबार में लौट आए। यमदूतों ने कांपते हुए यमराज से पूछा कि हे प्रभु! क्या कोई ऐसा उपाय या विधान नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु और इस असहनीय पीड़ा से बच सके? तब यमदूतों की करुणा देखकर स्वयं यमराज द्रवित हो गए और उन्होंने कहा कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी की रात जो भी प्राणी मेरे निमित्त दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके चौमुखा दीपक जलाएगा, उसके घर में कभी किसी की अकाल मृत्यु नहीं होगी और न ही मेरे दूत उस घर में प्रवेश करेंगे। तभी से धनतेरस के दिन अकाल मृत्यु के निवारण और परिजनों के दीर्घायु जीवन के लिए यम का दीपक जलाने की परंपरा अनवरत रूप से चली आ रही है।