नवरात्रि के छठे दिन ऐसे करें मां कात्यायनी की पूजा, जानिए शुभ मुहूर्त, विधि, प्रिय भोग, सिद्ध मंत्र और आरती
शारदीय नवरात्रि का छठा दिन आदिशक्ति मां दुर्गा के छठे स्वरूप देवी कात्यायनी को पूर्णतः समर्पित होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि कात्यायन की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था, जिसके कारण इनका नाम 'कात्यायनी' पड़ा। मां कात्यायनी को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है क्योंकि इन्होंने ही देवताओं को अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए महापापी महिषासुर का संहार किया था। मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है; इनका वाहन सिंह है और इनकी चार भुजाएं हैं। दाहिनी ओर के ऊपर वाले हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले में वरद मुद्रा है, जबकि बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है। मां कात्यायनी की साधना करने से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति सहज ही हो जाती है।
पूजा का शुभ मुहूर्त और प्रिय रंग
नवरात्रि के छठे दिन की पूजा के लिए प्रातः काल का ब्रह्म मुहूर्त और संध्या काल में गोधूलि वेला अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। सुबह 04:40 बजे से लेकर 05:30 बजे तक ब्रह्म मुहूर्त रहेगा, जो आत्मिक ध्यान और मंत्र जप के लिए सर्वश्रेष्ठ है। इसके उपरांत प्रातः 07:45 बजे से 09:15 बजे तक लाभ का चौघड़िया तथा 11:45 बजे से 12:35 बजे तक अभिजित मुहूर्त रहेगा, जिसमें षष्ठी पूजन का संकल्प और मुख्य अनुष्ठान किया जा सकता है। मां कात्यायनी को लाल और पीला रंग अत्यंत प्रिय है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह देवगुरु बृहस्पति और मंगल का प्रतिनिधित्व करती हैं, इसलिए साधक को इस दिन लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूजा में बैठना चाहिए।
संपूर्ण पूजा विधि: कैसे करें मां कात्यायनी का आह्वान?
नवरात्रि के छठे दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ पीले या लाल वस्त्र पहनें और पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। सबसे पहले हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत एवं पूजन का संकल्प लें। इसके बाद कलश देवता, प्रथम पूज्य भगवान गणेश और नवग्रहों का ध्यान करें। मां कात्यायनी की प्रतिमा या चित्र को गंगाजल से प्रतीकात्मक स्नान कराएं और चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। देवी को लाल चंदन, रोली, अक्षत, हल्दी, कुमकुम और सुगंधित धूप-दीप अर्पित करें। मां कात्यायनी को लाल रंग के पुष्प, विशेषकर लाल गुलाब या गुड़हल का फूल अति प्रिय हैं, इसलिए उन्हें लाल फूलों की माला अवश्य अर्पित करें। देवी के समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और षोडशोपचार विधि से पूजन संपन्न करें।
मां कात्यायनी का प्रिय भोग और महत्व
मां कात्यायनी को शहद (मधु) का भोग अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि षष्ठी तिथि के दिन माता रानी को शुद्ध शहद का भोग लगाने से व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार की कड़वाहट दूर होती है और व्यक्तित्व में आकर्षण व ओज की वृद्धि होती है। इसके अलावा मां को मालपुआ, पीले फल और हलवे का नैवेद्य भी अर्पित किया जाता है। भोग लगाने के बाद उस प्रसाद को परिवार के सभी सदस्यों में वितरित करना चाहिए और स्वयं भी ग्रहण करना चाहिए।
शीघ्र विवाह और वैवाहिक सुख के लिए सिद्ध मंत्र
मां कात्यायनी की कृपा से विवाह में आ रही सभी प्रकार की बाधाएं, मांगलिक दोष और योग्य वर या वधू की तलाश तत्काल पूरी होती है। द्वापर युग में गोपियों ने भगवान श्री कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए कालिंदी तट पर मां कात्यायनी की ही पूजा की थी। जिन जातकों के विवाह में विलंब हो रहा हो, उन्हें इस दिन पीले वस्त्र पहनकर हल्दी की गांठ अर्पित करते हुए इस प्रसिद्ध मंत्र का 108 बार लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला से जप करना चाहिए:
कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥
सामान्य पूजा और रक्षा के लिए बीज मंत्र:
क्लीं श्रीं त्रिनेत्रायै नमः।
या
ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥
ध्यान मंत्र:
स्वर्णाज्ञा चक्रस्थितां षष्ठम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
मां कात्यायनी की पावन आरती
जय कात्यायनी माता, मैया जय कात्यायनी माता।
नरेंद्र-मुनि सब ध्यावत, सुर-नर मुनि सब ध्यावत, सुरपति सुखदाता॥
मैया जय कात्यायनी माता...
कात्यायन मुनि की तुम, कन्या रूप धरी।
देवताओं के कारज, मैया पूर्ण करी॥
मैया जय कात्यायनी माता...
महिषासुर को मारा, दानव दल संहारा।
तीनों लोक उबारे, जय-जय जयकारा॥
मैया जय कात्यायनी माता...
चार भुजा अति शोभित, खड्ग कमल धारे।
सिंह सवारी साजे, भक्तन कष्ट टारे॥
मैया जय कात्यायनी माता...
जो जन तुमको ध्यावे, मनवांछित फल पावे।
दुख-दारिद्र्य मिटे सब, सुख-संपत्ति आवे॥
मैया जय कात्यायनी माता...
जय कात्यायनी माता, मैया जय कात्यायनी माता।
कृपा करो हे जगजननी, शरण तुम्हारी आता॥