'धन के निमित्त धर्म नहीं त्यागूंगा, छिड़ गया युद्ध तो बम-गोले भी दागूंगा', काशी में संन्यासियों को योगी का कड़ा संदेश
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने धर्म, धन और राष्ट्र के प्रति संन्यासियों के दायित्व को लेकर एक बेहद ओजस्वी और सीधा संदेश दिया है। वाराणसी के सिगरा स्थित भारत सेवाश्रम संघ के शताब्दी वर्ष समारोह को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि सनातन परंपरा में एक संन्यासी केवल माला जपने या व्यक्तिगत मोक्ष की साधना तक सीमित नहीं होता, बल्कि राष्ट्र और समाज की रक्षा करना उसका प्राथमिक कर्तव्य है। अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक सच्चे संन्यासी का यही ध्येय होना चाहिए कि वह धन के निमित्त कभी धर्म का त्याग न करे, और यदि राष्ट्र व धर्म की रक्षा के लिए युद्ध छिड़ जाए, तो वह बम-गोले दागने और शस्त्र उठाने से भी पीछे न हटे। योगी आदित्यनाथ के इस बयान ने पूरे सभागार में उपस्थित संतों और श्रद्धालुओं में नया जोश भर दिया।
'धन के लिए धर्म का सौदा नहीं, संन्यासी का जीवन राष्ट्र को समर्पित'
मुख्यमंत्री ने धर्म और धन के संबंधों की व्याख्या करते हुए कहा कि भौतिकवादी दौर में कई बार लोग धन के प्रलोभन में आकर अपने जीवन मूल्यों और सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं। उन्होंने संतों और संन्यासियों को आगाह करते हुए कहा कि संन्यास का मार्ग त्याग और सत्य का मार्ग है। किसी भी संन्यासी के लिए धन या भौतिक संपदा कभी साध्य नहीं हो सकती। धर्म ही उसका सबसे बड़ा धन है और जब तक कोई संन्यासी धन के प्रलोभन से मुक्त रहेगा, तभी तक उसकी वाणी और तप में वास्तविक तेज बना रहेगा। योगी ने कहा कि इतिहास साक्षी है कि जब-जब धर्म के संरक्षकों ने धन और निजी स्वार्थ को आगे रखा, तब-तब समाज का पतन हुआ है, इसलिए एक संन्यासी को सदैव धन से ऊपर उठकर धर्म और राष्ट्रहित को प्राथमिकता देनी होगी।
शांति के समय सेवा और संकट के समय रणभूमि का आह्वान
योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट किया कि सनातन संस्कृति कभी भी आक्रामकता या अकारण हिंसा का समर्थन नहीं करती, लेकिन कायरता और पलायनवाद को भी धर्म नहीं मानती। उन्होंने कहा कि शांति काल में संन्यासी का धर्म दीन-दुखियों की सेवा, अन्नक्षेत्र चलाना, शिक्षा का प्रसार और समाज को समर्थ बनाना है। लेकिन यदि देश पर कोई विपत्ति आती है, मातृभूमि की संप्रभुता को चुनौती मिलती है या सनातन धर्म पर प्रहार होता है, तो संन्यासियों को मौन रहने के बजाय अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना पड़ेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि जरूरत पड़ने पर संन्यासियों को शस्त्र धारण करने और युद्ध के मैदान में उतरकर प्रहार करने से कतई नहीं हिचकना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के लिए किया गया हर त्याग और संघर्ष महान होता है।
स्वामी प्रणवानंद जी महाराज के क्रांतिकारी विचारों को किया याद
अपने संबोधन में सीएम योगी ने भारत सेवाश्रम संघ के संस्थापक स्वामी प्रणवानंद जी महाराज के क्रांतिकारी जीवन दर्शन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्वामी प्रणवानंद जी केवल आध्यात्मिक संत नहीं थे, बल्कि वे हिंदू समाज में आत्मरक्षा, संगठन और शक्ति के संचारक थे। पराधीनता के दौर में जब समाज निराशा में डूबा था, तब स्वामी जी ने युवाओं और संन्यासियों को लाठी चलाने, व्यायाम करने और शस्त्र कला सीखने के लिए प्रेरित किया था। योगी ने याद दिलाया कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी कांग्रेस की तुष्टिकरण नीतियों के खिलाफ खड़े होने और राष्ट्रहित में नया राजनीतिक मंच तैयार करने की प्रेरणा स्वामी प्रणवानंद जी महाराज से ही प्राप्त हुई थी।
शक्ति और भक्ति का समन्वय ही विकसित भारत का आधार
मुख्यमंत्री ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि सनातन संस्कृति में शक्ति के बिना भक्ति अधूरी मानी गई है। उन्होंने मां दुर्गा के अस्त्र-शस्त्रों और भगवान शिव के त्रिशूल का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे सभी देवी-देवता शस्त्रधारी हैं, जो यह सिखाते हैं कि सज्जनों की रक्षा और दुर्जनों के दलन के लिए शक्ति का संचय अनिवार्य है। सीएम योगी ने कहा कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जिस विकसित और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण हो रहा है, उसकी नींव में भी यही शक्ति और सांस्कृतिक स्वाभिमान का भाव निहित है। जब तक देश का आध्यात्मिक समाज आंतरिक रूप से संगठित, निडर और साधन-संपन्न रहेगा, तब तक भारत की अखंडता और गौरव पर कोई आंच नहीं आ सकती।