धनतेरस पर सोना-चांदी खरीदना नहीं है बजट में? न हों परेशान, महज 10 से 50 रुपये की ये 6 शुभ चीजें घर लाते ही प्रसन्न होंगी मां लक्ष्मी

धनतेरस पर सोना-चांदी खरीदना नहीं है बजट में? न हों परेशान, महज 10 से 50 रुपये की ये 6 शुभ चीजें घर लाते ही प्रसन्न होंगी मां लक्ष्मी

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी यानी धनतेरस के आते ही देश भर के बाजार सज जाते हैं और हर ओर खरीदारी की रौनक छा जाती है। आम जनमानस में यह आम धारणा बन चुकी है कि धनतेरस का अर्थ केवल सोने के गहने, चांदी के सिक्के या महंगी गाड़ियां खरीदना ही है। लेकिन सनातन धर्म, मत्स्य पुराण और लोक मान्यताओं की गहराई में उतरें, तो सच इसके बिल्कुल विपरीत नजर आता है। शास्त्रों में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं लिखा गया कि मां लक्ष्मी और आरोग्य के देव भगवान धन्वंतरि की कृपा केवल बहुमूल्य धातुओं से ही प्राप्त की जा सकती है। भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव सादगी, प्रकृति और आस्था में बसा है, जहां गरीब और अमीर दोनों के लिए देवताओं की अनुकंपा एक समान उपलब्ध है। यदि इस वर्ष आपका बजट सोने या चांदी की भारी भरकम खरीदारी की अनुमति नहीं दे रहा है, तो मन छोटा करने की रत्ती भर भी जरूरत नहीं है। हमारे मनीषियों ने धनतेरस पर कुछ ऐसी अत्यंत सुलभ, सस्ती और दिव्य मानी जाने वाली 6 वस्तुओं के क्रय का विधान बनाया है, जिन्हें घर लाते ही परिवार में सुख, शांति, निरोगी काया और अखंड समृद्धि का संचार होने लगता है।

भगवान धन्वंतरि की प्रिय धातु पीतल के बर्तन: आरोग्यता और गृह शांति का पावन वरदान

धनतेरस के पावन अवसर पर सोने-चांदी का सबसे उत्तम और शास्त्रसम्मत विकल्प पीतल के बर्तन हैं। पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब क्षीरसागर के मंथन से भगवान धन्वंतरि अवतरित हुए थे, तो उनके करकमलों में जो अमृत कलश था, वह पीतल धातु का ही बना हुआ था। इसी वजह से पीतल को देव वैद्य धन्वंतरि की सर्वाधिक प्रिय धातु का दर्जा प्राप्त है। यदि आप कोई बड़ा बर्तन नहीं खरीद सकते, तो पूजा के लिए पीतल का एक छोटा सा लोटा, चम्मच, आचमनी, घंटी या दीपक खरीद लेना भी पूरे परिवार के कल्याण के लिए पर्याप्त माना जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के पारंपरिक बाजारों में धनतेरस पर पीतल के बर्तनों की दुकानों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ इसी श्रद्धा भाव से उमड़ती है। यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम का ध्यान रखना जरूरी है कि बाजार से जब भी पीतल या तांबे का बर्तन घर लाएं, तो उसे कभी भी भीतर खाली प्रवेश न कराएं। सनातन परंपरा में खाली बर्तन को घर में लाना रिक्तता का सूचक माना जाता है, इसलिए दुकान से निकलते समय ही उसमें थोड़ा सा शुद्ध जल, बताशा, अक्षत या सूखा अनाज अवश्य डलवा लें ताकि घर में संपन्नता का आगमन हो।

दरिद्रता को घर की चौखट से बाहर खदेड़ने वाली झाड़ू: साक्षात महालक्ष्मी का वास

धनतेरस के दिन नई झाड़ू खरीदने की परंपरा भारतीय घरों में सदियों से अनवरत चली आ रही है। मत्स्य पुराण और अग्नि पुराण के अनुसार झाड़ू में माता महालक्ष्मी का वास माना गया है, क्योंकि यह घर से गंदगी, मलिनता और आलस्य को बाहर निकालती है और जहां स्वच्छता होती है, वहीं लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है। आधुनिक वास्तु शास्त्र भी मानता है कि घर के कोने-कोने में जमी नकारात्मक ऊर्जा को झाड़ू के माध्यम से ही दूर किया जाता है। धनतेरस के दिन सींक वाली या फूल वाली नई झाड़ू अवश्य खरीदनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार इस दिन झाड़ू लाने से घर का वास्तु दोष शांत होता है और पुराने कर्ज व आर्थिक संकटों से मुक्ति मिलने का मार्ग प्रशस्त होता है। नई झाड़ू को घर लाने के बाद उसकी डंडी पर सफेद या लाल धागा बांधकर और कुमकुम का तिलक लगाकर उसका आदरपूर्वक पूजन किया जाता है। इसके पश्चात इस झाड़ू का उपयोग दीपावली के दिन घर की सफाई में शुरू किया जाता है, जिससे घर की दरिद्रता का समूल नाश होकर घर में सुख-शांति की सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है।

महज 10 रुपये का साबुत धनिया: अक्षय धन और स्थायी बरकत का सबसे शक्तिशाली टोटका

यदि धनतेरस पर सबसे कम खर्च में सबसे अधिक पुण्य और आर्थिक लाभ प्राप्त करना हो, तो साबुत खड़ा धनिया खरीदना सबसे अचूक उपाय माना गया है। धनिया केवल रसोई का मसाला नहीं है, बल्कि सनातन परंपरा में इसे अखंड सौभाग्य और अक्षय निधि का प्रतीक माना गया है। धनतेरस की शाम को जब आप बाजार निकलें, तो किसी भी परचून की दुकान से 10 या 20 रुपये का साबुत धनिया जरूर खरीदकर घर लाएं। इस धनिए को दीपावली की पावन रात्रि में माता महालक्ष्मी और भगवान श्रीगणेश के चरणों में एक मिट्टी के दीये या लाल कपड़े पर रखकर अर्पित किया जाता है। पूजन संपन्न होने के बाद इस अभिमंत्रित धनिए के दो हिस्से किए जाते हैं; एक हिस्से को लाल रेशमी कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी, गल्ले या धन रखने के स्थान पर रख दिया जाता है, जिससे सालभर अनावश्यक खर्चों पर रोक लगती है और धन की आवक बढ़ती है। वहीं दूसरे हिस्से को घर के आंगन, छत या किसी गमले में बो दिया जाता है; मान्यता है कि यदि वह धनिया हरा-भरा और घना उगता है, तो आने वाले पूरे वर्ष परिवार में आर्थिक समृद्धि और व्यापार में लगातार उन्नति देखने को मिलती है।

नया पिसा या डली वाला नमक: नकारात्मक शक्तियों और नजर दोष को पलभर में सोखने वाला अचूक तत्व

वास्तु और ज्योतिष शास्त्र में साधारण नमक को चंद्रमा और शुक्र का प्रतीक माना गया है, जो घर के सूक्ष्म वातावरण को शुद्ध करने की अद्भुत क्षमता रखता है। धनतेरस के दिन घर के लिए नमक का एक नया पैकेट या सेंधा नमक की डली खरीदना बेहद कल्याणकारी माना गया है। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि धनतेरस के दिन खरीदा गया नमक घर में सुख-समृद्धि लाता है और पुराने रोगों व पारिवारिक कलह को समाप्त करता है। धनतेरस के दिन खरीदे गए इसी नए नमक का उपयोग दीपावली की रात बनने वाले पकवानों और विशेष भोजन में किया जाना चाहिए, जिससे परिवार के सभी सदस्यों के बीच आपसी प्रेम और सौहार्द में प्रगाढ़ता आती है। इसके अलावा, धनतेरस के दिन इस नए नमक का थोड़ा सा हिस्सा पानी में मिलाकर पूरे घर में पोछा लगाने से कमरों में वर्षों से जमा नकारात्मक तरंगे, नजर दोष और मानसिक तनाव पूरी तरह धुल जाते हैं और घर का वातावरण दिव्य ऊर्जा से सराबोर हो उठता है।

समुद्र मंथन का रत्न गोमती चक्र और पीली कौड़ियां: तिजोरी में धन को बांधकर रखने वाला गुप्त साधन

मां लक्ष्मी का प्राकट्य भी समुद्र मंथन से हुआ था और गोमती चक्र तथा पीली कौड़ियां भी समुद्र की ही देन हैं, यही कारण है कि ये दोनों वस्तुएं मां लक्ष्मी को प्राणों से भी अधिक प्रिय मानी जाती हैं। यदि आपका सामर्थ्य भारी आभूषण लेने का नहीं है, तो धनतेरस के शुभ मुहूर्त में किसी भी पूजा सामग्री की दुकान से 5 या 11 गोमती चक्र और पीली कौड़ियां खरीद लाएं। गोमती नदी और समुद्र तटों से प्राप्त होने वाला प्राकृतिक गोमती चक्र सुदर्शन चक्र का प्रतीक भी माना जाता है, जो हर प्रकार की तांत्रिक बाधाओं और बुरी नजर से घर की रक्षा करता है। धनतेरस के दिन लाकर इन्हें गंगाजल और कच्चे दूध से शुद्ध किया जाता है और दीपावली की महानिशा में मां लक्ष्मी के वैदिक मंत्रों से इनका षोडशोपचार पूजन होता है। इसके बाद इन कौड़ियों और गोमती चक्रों को एक पीले या लाल कपड़े में लपेटकर अपनी दुकान की तिजोरी, अलमारी या लॉकर में स्थापित कर दिया जाता है। इस साधारण से उपाय से धन का निरंतर क्षय होना बंद हो जाता है और व्यापार में अप्रत्याशित ग्राहकों की वृद्धि देखने को मिलती है।

कुम्हार के चाक से बने मिट्टी के दीपक और श्रीगणेश-लक्ष्मी की प्रतिमा: सात्विक ऊर्जा का दिव्य स्रोत

प्रकृति और पंचमहाभूतों से जुड़कर की गई पूजा ही सनातन धर्म का वास्तविक आधार है, और मिट्टी से बढ़कर पवित्र इस धरा पर कुछ भी नहीं है। धनतेरस के दिन मिट्टी के बने नए दीपक और दीपावली पूजन के लिए भगवान श्रीगणेश और मां लक्ष्मी की मिट्टी की नवीन प्रतिमाएं खरीदना हर सनातनी का परम कर्तव्य माना गया है। स्थानीय कुम्हारों द्वारा चाक पर तैयार किए गए मिट्टी के दीपक न केवल हमारी स्थानीय अर्थव्यवस्था और कारीगरों को संबल देते हैं, बल्कि घर में विशुद्ध सात्विक और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। शास्त्रों का निर्देश है कि धातु की मूर्तियां यदि पुरानी हों तो चल सकती हैं, परंतु दीपावली के दिन मिट्टी की नई प्रतिमाओं की ही प्राण-प्रतिष्ठा और पूजा का विधान फलित होता है। धनतेरस की शाम को मिट्टी का एक चौमुखी दीपक लेकर घर के मुख्य द्वार पर यमराज के निमित्त दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जलाना अकाल मृत्यु के भय को मिटाता है। इसलिए बिना किसी हीन भावना के, पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ इन 6 मंगलकारी वस्तुओं को घर लाएं और पूरे परिवार के साथ इस दीपोत्सव को आरोग्य, आनंद और सात्विक वैभव के साथ मनाएं।