16 या 17 अक्टूबर सरस्वती पूजा कब है? दूर करें सही तारीख का संशय, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

16 या 17 अक्टूबर सरस्वती पूजा कब है? दूर करें सही तारीख का संशय, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

शारदीय नवरात्रि के पावन दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों के साथ-साथ ज्ञान, विद्या, वाणी और कला की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की विशेष आराधना की परंपरा सदियों पुरानी है। खासकर दक्षिण भारत, महाराष्ट्र और गुजरात समेत कई क्षेत्रों में नवरात्रि के अंतिम दिनों में सरस्वती आह्वान, सरस्वती प्रधान पूजा और सरस्वती विसर्जन का भव्य अनुष्ठान किया जाता है। इस वर्ष कई श्रद्धालुओं के मन में तिथियों और नक्षत्रों के प्रभाव को लेकर संशय बना हुआ है कि मुख्य सरस्वती पूजा 16 अक्टूबर को संपन्न की जाए या 17 अक्टूबर को। पंचांग के अनुसार नक्षत्रों के संचरण और उदयातिथि के नियमों को समझकर इस भ्रम को आसानी से दूर किया जा सकता है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।

16 या 17 अक्टूबर: पंचांग अनुसार किस दिन है मुख्य पूजा?

वैदिक ज्योतिष और धर्मसिंधु के नियमों के अनुसार शारदीय नवरात्रि में मां सरस्वती की पूजा नक्षत्र चक्र पर आधारित होती है, जिसमें तीन प्रमुख चरण होते हैं—मूल नक्षत्र में सरस्वती आह्वान, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में सरस्वती प्रधान पूजा, और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में सरस्वती बलिदान/अर्चन व श्रवण नक्षत्र में विसर्जन। पंचांग की गणनाओं के मुताबिक 16 अक्टूबर को मूल नक्षत्र के प्रभाव काल में मां सरस्वती का विधिवत आह्वान और प्रतिष्ठा की जाती है। इसके पश्चात 17 अक्टूबर को जब पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र व्याप्त रहेगा, उस दिन मुख्य सरस्वती पूजन का विधान संपन्न होगा। इसलिए जो भक्त सरस्वती देवी का आह्वान और स्थापना करना चाहते हैं वे 16 अक्टूबर को यह प्रक्रिया शुरू करेंगे, जबकि किताबों, लेखनी, वाद्य यंत्रों और बही-खातों की प्रधान महापूजा 17 अक्टूबर को करना शास्त्रसम्मत और फलदायी रहेगा।

सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त और चौघड़िया समय

17 अक्टूबर को मुख्य सरस्वती पूजन के लिए प्रातः काल का समय अत्यंत मंगलकारी माना गया है। सुबह 06:25 बजे से लेकर 08:45 बजे तक अमृत और शुभ का चौघड़िया रहेगा, जो विद्या आरंभ और देवी पूजन के लिए सर्वोत्तम मुहूर्त है। इसके बाद दोपहर में 11:43 बजे से 12:30 बजे तक अभिजित मुहूर्त रहेगा, जिसमें किसी भी नए अध्ययन, कला अभ्यास या पुस्तक पूजन का कार्य किया जा सकता है। शाम के समय गोधूलि वेला में 05:45 बजे से 07:10 बजे तक मां शारदा की विशेष आरती और दीपदान का समय श्रेष्ठ रहेगा।

संपूर्ण पूजा विधि: कैसे करें विद्या की देवी का पूजन?

सरस्वती पूजन के दिन प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर पीले या श्वेत रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या पूजा स्थान में एक लकड़ी की चौकी पर पीला अथवा सफेद वस्त्र बिछाएं। उस पर मां सरस्वती की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें और उनके समक्ष भगवान गणेश का स्मरण करें। देवी को सफेद चंदन, रोली, अक्षत, पीले गेंदे के फूल और श्वेत कमल अर्पित करें। इसके बाद छात्र अपनी पुस्तकें, कॉपियां, कलम और कलाकार अपने वाद्य यंत्र मां के चरणों में रखकर पूजन करें। देवी को धूप, अगरबत्ती और गाय के शुद्ध घी का दीपक दिखाएं। पूजा के दौरान मां सरस्वती के बीज मंत्र 'ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः' या प्रसिद्ध प्रार्थना 'या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता' का कम से कम 11 या 108 बार स्पष्ट उच्चारण के साथ पाठ करें।

प्रिय भोग और सरस्वती वंदना का धार्मिक महत्व

मां सरस्वती सात्विकता और पवित्रता का साक्षात स्वरूप हैं, इसलिए उन्हें अर्पित किया जाने वाला भोग भी अत्यंत सात्विक होना चाहिए। पूजा में देवी को बेसन के लड्डू, बूंदी, केसरिया खीर, मालपुआ, सफेद बर्फी, मिश्री-मखाना और पीले मौसमी फल जैसे केला, सिंघाड़ा और बेर अर्पित किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि में सरस्वती पूजा करने से साधक की बुद्धि प्रखर होती है, वाणी में मधुरता व सत्य का वास होता है और अज्ञानता का अंधकार मिट जाता है। जो विद्यार्थी पढ़ाई में एकाग्रता की कमी महसूस करते हैं या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं, उनके लिए इस दिन का पूजन मानसिक स्पष्टता और सफलता का वरदान लेकर आता है।