धनतेरस पर 13 दीपक जलाने का क्या है रहस्य? घर के किन 13 स्थानों पर दीये प्रज्वलित करने से दूर होगी अकाल मृत्यु
सनातन संस्कृति में पांच दिवसीय प्रकाश पर्व दीपोत्सव का आरंभ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी यानी धनतेरस के पावन दिन से होता है। इस दिन सोना, चांदी, वाहन और नए बर्तनों की खरीदारी का जितना महत्व है, उससे कहीं अधिक फलदायी और अनिवार्य विधान प्रदोष काल में '13 दीपक' प्रज्वलित करने का माना गया है। शास्त्रों में 13 की संख्या को त्रयोदशी तिथि का साक्षात प्रतीक माना गया है। यह 13 दीप केवल मिट्टी के साधारण दीये नहीं होते, बल्कि ये व्यक्ति के जीवन से 13 प्रकार के मानसिक, शारीरिक, आर्थिक और आध्यात्मिक अंधकारों का समूल नाश करने वाले दिव्य प्रकाश पुंज माने जाते हैं। धर्मसिंधु और स्कंद पुराण के अनुसार धनतेरस की संध्या पर विधि-विधान से जलाए गए ये 13 दीपक घर की नकारात्मक ऊर्जा, गृहक्लेश, वास्तु दोष और दरिद्रता को बाहर निकालते हैं तथा मृत्यु के देवता यमराज, आरोग्य के देवता भगवान धनवंतरी, धन के कोषाध्यक्ष भगवान कुबेर और ऐश्वर्य की देवी मां महालक्ष्मी को एक साथ संतुष्ट करते हैं। यदि इन दीपकों को सही दिशा, सही स्थान और उचित भावना के साथ स्थापित किया जाए, तो वर्ष भर परिवार में धन-धान्य की कोई कमी नहीं रहती।
धनतेरस 2026 पर दीपदान का सबसे शुभ मुहूर्त: प्रदोष काल और स्थिर लग्न का महासंयोग
धनतेरस पर दीपदान सदैव सूर्यास्त के उपरांत 'प्रदोष काल' में किया जाना शास्त्रसम्मत माना गया है। वर्ष 2026 में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी 6 नवंबर (शुक्रवार) को पूरे दिन और प्रदोष काल में व्याप्त रहेगी। इस दिन दीपदान और पूजन का सर्वश्रेष्ठ समय शाम 05 बजकर 32 मिनट से रात्रि 08 बजकर 09 मिनट तक रहेगा। इसी प्रदोष काल के दौरान शाम 06 बजकर 02 मिनट से लेकर शाम 07 बजकर 57 मिनट तक स्थिर वृषभ लग्न विद्यमान रहेगा। स्थिर लग्न में दीप प्रज्वलित करने से मां लक्ष्मी और कुबेर देव का आपके निवास स्थान पर स्थायी वास होता है और वह दीपक अकाल मृत्यु के संकट को टालने वाला सिद्ध होता है। श्रद्धालुओं को सलाह दी जाती है कि वे शाम 06:00 बजे से 08:00 बजे के मध्य ही अपने घर में इन 13 दीपकों का दीपदान पूर्ण कर लें।
पहला और सबसे मुख्य दीपक: यमराज के निमित्त चौमुखा यम दीपक
13 दीपकों में सबसे पहला और सर्वोपरि दीपक मृत्यु के देवता यमराज के निमित्त समर्पित होता है। यह एक बड़ा पुराना या नया मिट्टी अथवा आटे से बना चौमुखा (चार बत्तियों वाला) दीपक होता है। इसमें शुद्ध सरसों का या तिल का तेल भरा जाता है और उसमें थोड़ा सा काला तिल व एक तांबे का सिक्का या कौड़ी डाली जाती है। इस दीपक को घर के मुख्य द्वार के ठीक बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके कूड़ेदान के पास या दहलीज की बाईं तरफ रखा जाता है। दक्षिण दिशा यमराज की दिशा मानी जाती है। इसे प्रज्वलित करते समय परिवार के किसी वरिष्ठ सदस्य को 'मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥' मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। मान्यता है कि इस दीपक के जलने से उस घर के किसी भी सदस्य की वर्ष भर अकाल मृत्यु या किसी गंभीर प्राणघातक दुर्घटना से रक्षा होती है। यम दीपक जलाने के बाद उसे पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए और न ही घर का कोई सदस्य उसके बाद बाहर निकले।
दूसरा से सातवां दीपक: पूजा घर, तुलसी, मुख्य द्वार, रसोई और जल स्रोत पर प्रज्वलित करें
यम दीपक के पश्चात शेष 12 दीपकों को घर के भीतर और आसपास के महत्वपूर्ण ऊर्जा केंद्रों पर स्थापित किया जाता है। दूसरा दीपक घर के मंदिर या पूजा स्थल में भगवान श्रीहरि विष्णु, मां लक्ष्मी, गणेश जी और कुबेर देव के समक्ष गाय के शुद्ध घी से जलाया जाता है, जो अखंड सौभाग्य का प्रतीक है। तीसरा दीपक घर के आंगन में स्थापित पवित्र तुलसी के पौधे की जड़ के पास रखा जाता है; यह दीपक मां लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय है और इससे घर का वातावरण पवित्र बनता है। चौथा दीपक घर के मुख्य प्रवेश द्वार (दहलीज) के दाएं हिस्से में रखा जाता है, ताकि मां लक्ष्मी का घर में सीधा और निर्विघ्न आगमन हो सके। पांचवां दीपक रसोई घर में चूल्हे के समीप या अन्न भंडार के पास जलाया जाता है, जो मां अन्नपूर्णा का स्थान है; इससे घर में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होती। छठा दीपक घर में पीने के पानी के स्रोत (नल, मटका या जल भंडारण स्थल) के पास रखा जाता है, जो वरुण देव और पितरों को शांति प्रदान करता है और पितृदोष को समाप्त करता है। सातवां दीपक घर की छत या मुंडेर पर आकाश की ओर मुख करके रखा जाता है, जिसे 'आकाश दीप' कहते हैं; यह सभी दिशाओं से आने वाली ऊपरी बाधाओं को दूर करता है।
आठवां से तेरहवां दीपक: तिजोरी, खिड़की, वाहन, स्टोर रूम और चौराहों पर करें स्थापित
आठवां दीपक घर की तिजोरी, अलमारी या उस स्थान पर रखा जाता है जहां आप नकदी, बहीखाते और आभूषण रखते हैं; यह कुबेर देव को आकर्षित करता है। नौवां दीपक घर की मुख्य खिड़की या बालकनी में पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है, जिससे सकारात्मक प्राण ऊर्जा का संचार घर के अंदर बना रहे। दसवां दीपक घर में मवेशियों के स्थान (गौशाला) अथवा वाहन पार्किंग की जगह पर लगाया जाता है, ताकि वाहन दुर्घटनाओं से बचे रहें और पशुधन सुरक्षित रहे। ग्यारहवां दीपक घर के सबसे अंधेरे कोने, सीढ़ियों के नीचे या स्टोर रूम में रखा जाता है; इस स्थान पर दीपक जलाने से घर में छिपी नकारात्मकता, आलस्य और वास्तु जनित दोष जलकर भस्म हो जाते हैं। बारहवां दीपक घर की बाउंड्री या पिछले दरवाजे पर लगाया जाता है ताकि कोई भी नकारात्मक शक्ति घर की परिधि में प्रवेश न कर सके। तेरहवां और अंतिम दीपक घर के समीप स्थित किसी मंदिर, पीपल के वृक्ष की जड़ में अथवा पास के किसी चौराहे पर जाकर रख दिया जाता है; इसे जन-कल्याण और समस्त अनिष्ट शक्तियों की शांति का प्रतीक माना जाता है।
13 दीपकों को जलाने के अनिवार्य नियम और सावधानियां
धनतेरस के पावन दीपदान को करते समय शास्त्रों द्वारा निर्धारित मर्यादाओं का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है। कभी भी मिट्टी के खंडित, टूटे हुए या चटके हुए दीयों का प्रयोग न करें। मंदिर और तुलसी के पास केवल गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए, जबकि यम दीपक, चौखट और बाहरी स्थानों पर तिल के तेल अथवा सरसों के तेल का दीपक जलाना श्रेयस्कर माना गया है। किसी भी दीपक को सीधे जमीन पर न रखें; दीपक के नीचे थोड़े से साबुत अक्षत (बिना टूटे चावल), गेहूं के दाने, खील या लाल फूल का आसन अवश्य दें। दीपकों को जलाते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए, केवल यम दीपक का मुख दक्षिण दिशा की तरफ रखा जाता है। दीप प्रज्वलित करने के बाद कभी भी मुंह से फूंक मारकर या हाथ के पंखे से बुझाने का प्रयास न करें। इन 13 दीपकों का यह सात्विक अनुष्ठान आपके घर-परिवार को आरोग्य, ऐश्वर्य और दीर्घायु का वरदान प्रदान करता है।