भुवनेश्वर कुमार की 4 साल बाद वापसी का सारा उत्साह पस्त, 3 मैचों के लचर प्रदर्शन ने दिखाया बाहर का रास्ता
भारतीय क्रिकेट टीम के अनुभवी स्विंग मास्टर भुवनेश्वर कुमार की लंबे अरसे बाद मैदान पर वापसी को लेकर क्रिकेट प्रेमियों और विशेषज्ञों के बीच जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा था। घरेलू क्रिकेट और प्रतिस्पर्धी स्तर पर लगभग चार साल के लंबे अंतराल और लगातार फिटनेस संघर्षों के बाद जब उन्हें दोबारा मुख्यधारा में अपनी योग्यता साबित करने का मंच मिला, तो ऐसा लगा कि उनका पुराना स्विंग और अनुभव टीम के तेज गेंदबाजी आक्रमण को नई मजबूती प्रदान करेगा।
हालांकि, यह बहुप्रतीक्षित वापसी उम्मीदों के मुताबिक साबित नहीं हो सकी। शुरुआती तीन मुकाबलों में उनके द्वारा की गई साधारण और दिशाहीन गेंदबाजी ने समर्थकों को पूरी तरह निराश कर दिया। मैदान पर उस धार और लय की भारी कमी नजर आई जिसके लिए वे कभी दुनिया भर के शीर्ष बल्लेबाजों में खौफ का पर्याय माने जाते थे। नतीजतन, उत्साह का माहौल अचानक बदल गया और लगातार गिरते प्रदर्शन ने उन्हें एकादश से बाहर किए जाने की ओर धकेल दिया।
3 मुकाबलों का वो प्रदर्शन जिसने बिगाड़ा पूरा समीकरण
क्रिकेट के शीर्ष स्तर पर वापसी करने वाले किसी भी दिग्गज गेंदबाज को खुद को ढालने के लिए कुछ समय की जरूरत होती है, लेकिन इन तीन मुकाबलों में भुवनेश्वर कुमार का प्रदर्शन रणनीतिक स्तर पर टीम के लिए काफी नुकसानदेह साबित हुआ।
शुरुआती ओवरों में गेंद को दोनों तरफ घुमाने की जो स्वाभाविक कला उनकी सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी, वह पूरी तरह गायब दिखी। सपाट पिचों पर गति में गिरावट और सही लेंथ न पकड़ पाने के कारण विरोधी बल्लेबाजों ने उन पर पहले ही ओवर से आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया।
आंकड़ों के लिहाज से देखा जाए तो तीनों मुकाबलों में उनका इकॉनमी रेट लगातार आसमान छूता रहा और वे अहम मौकों पर विपक्षी टीम का कोई बड़ा विकेट चटकाने में नाकाम रहे। विशेषकर पारी के अंतिम ओवरों (डेथ ओवर्स) में, जहां भुवी अपनी सटीक यॉर्कर और धीमी गति की गेंदों के लिए जाने जाते थे, वहां उन्होंने जमकर रन लुटाए।
गति की कमी और स्विंग का न मिलना बना सबसे बड़ी कमजोरी
तेज गेंदबाजी के आधुनिक दौर में जब लगभग हर टीम के पास 140 किमी प्रति घंटे से अधिक की गति से गेंदबाजी करने वाले आक्रामक विकल्प मौजूद हैं, वहां भुवनेश्वर कुमार की गति का 125 से 130 किमी प्रति घंटे के आसपास सिमट जाना बल्लेबाजों के लिए आसान निशाना बन गया।
जब तक हवा और पिच से गेंद को जबरदस्त स्विंग मिल रही थी, तब तक यह गति कारगर साबित होती थी। लेकिन सफेद गेंद के मौजूदा खेल में जहां शुरुआती दो-तीन ओवरों के बाद गेंद का मूवमेंट लगभग खत्म हो जाता है, वहां भुवनेश्वर के पास बल्लेबाजों को रोकने के लिए कोई दूसरा मजबूत हथियार नजर नहीं आया।
इसके अलावा, लगातार चोटों और लंबे रिहैबिलिटेशन का असर उनके बॉलिंग एक्शन और रिलीज पॉइंट पर भी साफ दिखा। वे बल्लेबाजों को आगे आकर ड्राइव करने के लिए विवश नहीं कर पा रहे थे, जिसके चलते बल्लेबाज बैकफुट पर जाकर आसानी से मनचाहे शॉट्स खेल रहे थे।
नए और युवा तेज गेंदबाजों के उभार ने बढ़ाई मुश्किलें
भुवनेश्वर कुमार के सामने केवल अपनी खराब फॉर्म से निपटने की चुनौती नहीं है, बल्कि घरेलू क्रिकेट और आईपीएल की नर्सरी से निकल रहे कई युवा और तेजतर्रार गेंदबाज पहले से ही दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।
टीम प्रबंधन अब भविष्य की योजनाओं और बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों को ध्यान में रखते हुए ऐसे तेज गेंदबाजों को लगातार तरजीह दे रहा है जो गेंद की रफ्तार के साथ-साथ उछाल हासिल करने का दम रखते हों। ऐसे में जब किसी वरिष्ठ खिलाड़ी को वापसी का मौका दिया जाता है और वह लगातार तीन मौकों पर प्रभाव छोड़ने में असफल रहता है, तो चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट के लिए युवा विकल्पों की अनदेखी करना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
क्या अब करियर के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके हैं स्विंग किंग?
इस निराशाजनक प्रदर्शन के बाद क्रिकेट पंडितों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या भुवनेश्वर कुमार का शीर्ष स्तर का क्रिकेट अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है।
अपनी सटीक लाइन-लेंथ, असाधारण स्विंग और शांत स्वभाव से भारतीय क्रिकेट को अनगिनत यादगार जीत दिलाने वाले इस तेज गेंदबाज के लिए आगे की राह बेहद पथरीली नजर आती है। एक बार फिर टीम से बाहर का रास्ता दिखाए जाने के बाद उनके लिए वापसी के सारे दरवाजे लगभग बंद होते दिख रहे हैं। अब देखना यह होगा कि क्या वे घरेलू स्तर पर दोबारा अपनी फिटनेस और पुरानी लय हासिल करने के लिए संघर्ष जारी रखते हैं या फिर अपने शानदार करियर को अलविदा कहने का कोई बड़ा फैसला लेते हैं।