बारिश के खलल के बीच क्या DLS से जीतेगी टीम इंडिया? जानिए डकवर्थ-लुईस-स्टर्न नियम का पूरा गणित

बारिश के खलल के बीच क्या DLS से जीतेगी टीम इंडिया? जानिए डकवर्थ-लुईस-स्टर्न नियम का पूरा गणित

नई दिल्ली: क्रिकेट के मैदान पर जब भी आसमान में काले घने बादल घिर आते हैं और मूसलाधार बारिश खेल को अचानक रोक देती है, तो मैदान पर मौजूद अंपायरों से लेकर टीवी स्क्रीन से चिपके करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों की नजरें स्कोरबोर्ड के बजाय सीधे डकवर्थ-लुईस-स्टर्न यानी डीएलएस (DLS) मेथड के गणितीय चार्ट पर टिक जाती हैं। सीमित ओवरों के क्रिकेट—खासकर वनडे और टी20 फॉर्मेट में—बारिश के व्यवधान के बाद मैच का नतीजा निकालने या संशोधित लक्ष्य निर्धारित करने के लिए यह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) का सबसे प्रामाणिक फॉर्मूला है। जब मैच में बारिश के कारण खेल रुकता है और भारतीय टीम मैदान में लक्ष्य का पीछा कर रही होती है या पहले गेंदबाजी कर चुकी होती है, तो हर भारतीय प्रशंसक के मन में बस एक ही सवाल कौंधता है: क्या टीम इंडिया पार स्कोर से आगे है? क्या बारिश न रुकने की स्थिति में भारत को सीधे विजेता घोषित किया जा सकता है? इस सवाल का उत्तर समझने के लिए क्रिकेट प्रशंसकों को डीएलएस नियम के पीछे की जटिल सांख्यिकी, ओवरों की न्यूनतम सीमा और 'रिसोर्स वैल्यू' के सिद्धांत को गहराई से समझना होगा।

डकवर्थ-लुईस-स्टर्न (DLS) मेथड क्या है और यह साधारण रन-रेट से कितना अलग है?

शुरुआती दशकों में जब सीमित ओवरों के मैचों में बारिश खलल डालती थी, तो विजेता का फैसला करने के लिए साधारण औसत रन-रेट (Average Run Rate) या मोस्ट प्रोडक्टिव ओवर्स (Most Productive Overs) नियम का इस्तेमाल किया जाता था। इसका सबसे कुख्यात उदाहरण 1992 के एकदिवसीय विश्व कप सेमीफाइनल में देखने को मिला था, जब दक्षिण अफ्रीका को इंग्लैंड के खिलाफ जीत के लिए 13 गेंदों पर 22 रन बनाने थे, लेकिन 12 मिनट की बारिश के बाद जब खेल शुरू हुआ तो स्कोरबोर्ड पर 1 गेंद में 21 रन बनाने का हास्यास्पद लक्ष्य दिखा दिया गया था। इस भारी विसंगति को दूर करने के लिए दो ब्रिटिश सांख्यिकीविदों फ्रैंक डकवर्थ और टोनी लुईस ने 1997 में एक बेहद वैज्ञानिक और गणितीय फॉर्मूला विकसित किया, जिसे डकवर्थ-लुईस (D/L) मेथड नाम दिया गया। बाद में ऑस्ट्रेलियाई गणितज्ञ और डेटा विशेषज्ञ प्रोफेसर स्टीवन स्टर्न ने आधुनिक टी20 क्रिकेट की आक्रामक रन-स्कोरिंग गति को शामिल करते हुए इस फॉर्मूले के सॉफ्टवेयर को अपडेट किया, जिसके बाद 2014 से इसका नाम आधिकारिक रूप से 'डकवर्थ-लुईस-स्टर्न (DLS) मेथड' कर दिया गया। यह नियम केवल ओवरों को नहीं देखता, बल्कि इस बात का पूरा हिसाब रखता है कि किसी टीम के पास कितने ओवर बचे हैं और उसके हाथ में कितने विकेट सुरक्षित हैं।

मैच का आधिकारिक नतीजा निकालने के लिए कितने ओवर का खेल होना है अनिवार्य?

बारिश की स्थिति में सबसे पहली और बुनियादी शर्त यह होती है कि दोनों टीमों को न्यूनतम आवश्यक ओवर खेलने का मौका मिलना चाहिए। यदि मैच में न्यूनतम ओवरों का कोटा पूरा नहीं होता, तो डीएलएस नियम लागू नहीं किया जा सकता और मैच को 'नो रिजल्ट' (रद्द) घोषित कर दिया जाता है। एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय (ODI) क्रिकेट में दोनों पारियों में कम से कम 20-20 ओवर का खेल पूरा होना अनिवार्य है। यदि पहली पारी 50 ओवर की पूरी हो चुकी है और दूसरी पारी में बल्लेबाजी कर रही टीम इंडिया ने अभी केवल 18 ओवर खेले हैं और बारिश के कारण खेल दोबारा शुरू नहीं हो पाता, तो भारत पार स्कोर से चाहे 50 रन आगे ही क्यों न हो, उसे विजेता घोषित नहीं किया जा सकता और मुकाबला बेनतीजा खत्म होगा। वहीं टी20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में यह न्यूनतम सीमा दोनों पारियों में कम से कम 5-5 ओवर की होती है। इसके अलावा, यदि पहली पारी के दौरान ही बारिश आ जाए और मैच को 20-20 ओवर (वनडे में) या 5-5 ओवर (टी20 में) से कम का करना पड़े, तो अंपायर मैच को शुरू ही नहीं कर सकते।

'रिसोर्स पर्सेंटेज' का गणित: ओवर और विकेटों का संतुलन कैसे तय करता है खेल?

डीएलएस प्रणाली की पूरी नींव 'रिसोर्स' (संसाधनों) पर टिकी है। क्रिकेट के किसी भी मैच की शुरुआत में दोनों टीमों के पास 100 प्रतिशत संसाधन होते हैं। ये संसाधन दो बुनियादी तत्वों से मिलकर बनते हैं: बचे हुए ओवर (Balls Remaining) और बचे हुए विकेट (Wickets in Hand)। जैसे-जैसे गेंदें फेंकी जाती हैं और विकेट गिरते हैं, टीम के संसाधन प्रतिशत में गिरावट आती जाती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी टीम के पास 50 ओवर के मैच में 30 ओवर बचे हैं और उसके 9 विकेट सुरक्षित हैं, तो उसका रिसोर्स पर्सेंटेज उस टीम की तुलना में काफी ज्यादा होगा जिसके पास 30 ओवर तो हैं लेकिन 6 विकेट गिर चुके हैं। डीएलएस का कंप्यूटर एल्गोरिदम मैच की गेंद-दर-गेंद स्थिति के आधार पर एक काल्पनिक 'पार स्कोर' (Par Score) की गणना करता रहता है। यह पार स्कोर वह न्यूनतम स्कोर होता है जो बल्लेबाजी कर रही टीम के उस विशेष गेंद और गिरे हुए विकेटों के आधार पर बराबरी (Tie) का माना जाता है।

चेज कर रही टीम इंडिया के लिए क्या बनता है समीकरण और पार स्कोर का महत्व?

यदि विपक्षी टीम पहले बल्लेबाजी करते हुए 50 ओवर में 280 रन बना चुकी है और भारतीय टीम लक्ष्य का पीछा कर रही है, तो बारिश आने की स्थिति में भारत का भाग्य इस बात पर निर्भर करेगा कि खेल रुकते वक्त भारत का वास्तविक स्कोर पार स्कोर से अधिक है या कम। यदि भारत ने न्यूनतम 20 ओवर पूरे कर लिए हैं और उस समय स्कोरबोर्ड पर टीम का स्कोर पार स्कोर से 1 रन भी अधिक है, और इसके बाद मैच दोबारा शुरू नहीं हो पाता, तो भारत को डीएलएस नियम के तहत विजयी घोषित कर दिया जाएगा। लेकिन यदि टीम इंडिया पार स्कोर से 1 रन भी पीछे पाई जाती है, तो विरोधी टीम जीत दर्ज कर लेगी। यहां सबसे निर्णायक भूमिका विकेटों की होती है। मान लीजिए 25 ओवर के खेल के बाद भारत का स्कोर 140 रन है। यदि भारत के केवल 2 विकेट गिरे हैं, तो पार स्कोर शायद 132 के करीब होगा और भारत आगे रहेगा। लेकिन यदि उसी 140 के स्कोर पर भारत के 5 विकेट गिर चुके हों, तो पार स्कोर बढ़कर 145 या 148 तक पहुंच सकता है, जिससे भारत अचानक हार की कगार पर पहुंच जाएगा। इसलिए बारिश की आशंका वाले मैचों में ड्रेसिंग रूम का संदेश हमेशा यही होता है कि रन गति बनाए रखने के साथ-साथ किसी भी कीमत पर विकेट न गंवाएं।

पहली पारी में बारिश आने पर टारगेट क्यों बढ़ जाता है? जानिए सबसे बड़ा कन्फ्यूजन

प्रशंसकों के बीच अक्सर यह सबसे बड़ा भ्रम रहता है कि जब मैच में ओवर कम कर दिए जाते हैं, तो लक्ष्य भी उसी अनुपात में कम होना चाहिए, लेकिन कई बार दूसरी पारी में बल्लेबाजी करने वाली टीम को ओवरों की तुलना में अप्रत्याशित रूप से बड़ा लक्ष्य मिल जाता है। ऐसा तब होता है जब पहली पारी के बीच में बारिश आती है। मान लीजिए पहले बल्लेबाजी करने वाली टीम ने 35 ओवर में 2 विकेट पर 200 रन बना लिए थे और अचानक बारिश आ गई जिसके कारण मैच को 35 ओवर का ही समाप्त घोषित करना पड़ा और दूसरी पारी को भी घटाकर 35 ओवर का कर दिया गया। ऐसी स्थिति में पहले बल्लेबाजी करने वाली टीम को यह नहीं पता था कि मैच 35 ओवर का ही होगा, इसलिए उसने अंतिम 15 ओवरों के स्लोग ओवरों में तेजी से रन बनाने के लिए अपने 8 विकेट बचाकर रखे थे, जिनका वह उपयोग नहीं कर सकी। यानी उसके 'रिसोर्स' का नुकसान हुआ। इस नुकसान की भरपाई करने के लिए कंप्यूटर सॉफ्टवेयर दूसरी पारी की बल्लेबाजी टीम के लक्ष्य में अतिरिक्त रन जोड़ देता है, ताकि पहली टीम के साथ कोई अन्याय न हो।

डकवर्थ-लुईस-स्टर्न सॉफ्टवेयर और ऑन-फील्ड अंपायरों का समन्वय

आधुनिक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अंपायरों और मैच रेफरी के पास आईसीसी द्वारा प्रमाणित विशेष डीएलएस सॉफ्टवेयर लैपटॉप में इंस्टॉल रहता है। जैसे ही किसी मैच के दौरान मैदान पर हल्की बूंदाबांदी शुरू होती है, स्कोरर और वीडियो एनालिस्ट हर गेंद के साथ बदल रहे पार स्कोर की आधिकारिक शीट प्रिंट करके दोनों टीमों के ड्रेसिंग रूम में भिजवाना शुरू कर देते हैं। इसके अलावा मैदान पर मौजूद बड़ी एलईडी स्क्रीनों पर भी अक्सर हर ओवर के बाद उस समय का पार स्कोर प्रदर्शित किया जाता है, ताकि मैदान पर खेल रहे बल्लेबाजों को यह स्पष्ट जानकारी रहे कि अगली गेंद पर चौका मारने से वे सेफ जोन में पहुंचेंगे या धीमा खेलने पर मैच हाथ से निकल जाएगा। यह तकनीकी पारदर्शिता कप्तानों को मैदान पर सटीक रणनीति बनाने में मदद करती है, जिससे वे बारिश आने से ठीक पहले बड़े शॉट खेलकर टीम को पार स्कोर से आगे ले जाने की कोशिश करते हैं।