'मोहम्मद शमी को जाते देखकर दिल दुखता है': टेस्ट क्रिकेट से संन्यास पर भावुक हुए भारतीय गेंदबाजी कोच मोर्ने मोर्कल
भारतीय क्रिकेट के आधुनिक इतिहास में तेज गेंदबाजी की नई क्रांति लिखने वाले दिग्गज पेसर मोहम्मद शमी के टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहने के फैसले ने क्रिकेट जगत को भावुक कर दिया है। 13 साल के सुनहरे और ऐतिहासिक सफर के बाद जब शमी ने लाल गेंद को हमेशा के लिए अलविदा कहा, तो इसका असर भारतीय ड्रेसिंग रूम में साफ देखा गया। भारतीय टीम के गेंदबाजी कोच मोर्ने मोर्कल ने शमी के इस फैसले पर बेहद संजीदा प्रतिक्रिया देते हुए स्वीकार किया कि शमी जैसे महान गेंदबाज को विदा होते देखना किसी भी कोच, साथी खिलाड़ी और क्रिकेट प्रेमी के लिए बेहद दर्दनाक क्षण है। मोर्कल ने कहा कि शमी केवल एक तेज गेंदबाज नहीं थे, बल्कि वे भारतीय टेस्ट आक्रमण की वह रीढ़ थे, जिसने दुनिया भर के मैदानों पर भारत को जीतना सिखाया। टेस्ट क्रिकेट के मैदान पर शमी की गैरमौजूदगी भारतीय तेज गेंदबाजी के एक गौरवशाली युग के अंत जैसी महसूस हो रही है। कोच ने जोर देकर कहा कि भले ही हर खिलाड़ी के जीवन में संन्यास का समय एक न एक दिन आता है, लेकिन जब शमी जैसा मैच विनर टेस्ट जर्सी उतारता है, तो टीम के भीतर एक बहुत बड़ा शून्य पैदा हो जाता है। शमी की अनुशासनबद्ध गेंदबाजी, किसी भी परिस्थिति में गेंद को लहराने का हुनर और मैच के निर्णायक मोड़ों पर विकेट निकालने की कुदरती क्षमता ने उन्हें टेस्ट क्रिकेट के सर्वकालिक महान गेंदबाजों की कतार में ला खड़ा किया था।
'हाथ से छूटती थी तो लगता था सीम बोल रही है': मोर्कल ने की सीम प्रेजेंटेशन की तारीफ
गेंदबाजी कोच मोर्ने मोर्कल, जो खुद दक्षिण अफ्रीका के दिग्गज तेज गेंदबाज रहे हैं, ने शमी की सीम प्रेजेंटेशन को दुनिया का सबसे बेहतरीन हुनर करार दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक क्रिकेट में गेंद को 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से फेंकते हुए उसकी सीम को बिल्कुल सीधा (Upright Seam) रखना एक ऐसी कला है, जो किसी भी कोचिंग मैनुअल से कहीं ऊपर है। शमी जब अपने रन-अप से आकर गेंद को रिलीज करते थे, तो गेंद हवा में इस तरह तैरती थी जैसे कोई कारीगर उस पर नक्काशी कर रहा हो। पिच पर टप्पा खाने के बाद गेंद किस तरफ कांटा बदलेगी, इसका अंदाजा दुनिया के बड़े से बड़े बल्लेबाज भी नहीं लगा पाते थे। मोर्कल के मुताबिक, उन्होंने अपने पूरे करियर में और बाद में कोचिंग के दौरान बहुत कम गेंदबाजों में ऐसी सहज रिलीज देखी है। शमी की कलाई की स्थिति और गेंद छोड़ते समय उनकी उंगलियों का नियंत्रण इतना अचूक था कि उपमहाद्वीप की सूखी पिचों से लेकर इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका की हरी-भरी घास वाली पिचों तक, उनका असर कभी कम नहीं हुआ। बल्लेबाजों के पैड पर लगातार वार करना और स्टंप्स को बिखेरना शमी का ट्रेडमार्क बन चुका था, जिसकी कमी अब टेस्ट मैचों के दौरान हमेशा खलेगी।
दूसरी पारी का बेताज बादशाह: असंभव परिस्थितियों में मैच पलटने की कला
टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में मोहम्मद शमी की सबसे बड़ी पहचान उनकी 'सेकंड इनिंग्स स्पेशलिस्ट' की छवि रही है। गेंदबाजी कोच ने इस पहलू पर विशेष चर्चा करते हुए कहा कि टेस्ट मैच के चौथे और पांचवें दिन जब पिच पूरी तरह टूट चुकी होती थी और धूप के कारण हवा में नमी खत्म हो जाती थी, तब शमी गेंद से आग उगलते थे। पुरानी गेंद से रिवर्स स्विंग निकालने में शमी का मुकाबला पूरे विश्व में कोई नहीं कर सकता था। मोर्कल ने याद दिलाया कि जब भी कप्तान को साझेदारी तोड़ने की सख्त जरूरत होती थी या जब विरोधी टीम मैच ड्रॉ कराने की दिशा में बढ़ रही होती थी, तब शमी का स्पेल पूरे मुकाबले का रुख भारत के पक्ष में मोड़ देता था। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ विशाखापट्टनम और सेंचुरियन में, इंग्लैंड के खिलाफ लॉर्ड्स और एजबेस्टन में, या ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न और पर्थ में खेले गए यादगार मुकाबले शमी की दूसरी पारी के उसी अदम्य साहस और आक्रमण के गवाह हैं। उनका मानना है कि थकी हुई टांगों और पसीने से तरबतर शरीर के बावजूद 90 मील प्रति घंटे की रफ्तार से रिवर्स स्विंग फेंकने का यह जज्बा केवल शमी जैसे जुझारू खिलाड़ी के पास ही था।
युवा गेंदबाजों के मार्गदर्शक: ड्रेसिंग रूम में छोड़ी अमिट सीख
गेंदबाजी कोच ने इस बात को भी रेखांकित किया कि शमी का प्रभाव केवल उनके द्वारा लिए गए 229 विकेटों तक सीमित नहीं था, बल्कि भारतीय तेज गेंदबाजी की अगली पीढ़ी को तराशने में उनकी भूमिका अमूल्य रही है। मोहम्मद सिराज, अर्शदीप सिंह, प्रसिद्ध कृष्णा और आकाश दीप जैसे उभरते हुए तेज गेंदबाजों के लिए शमी हमेशा एक बड़े भाई और मार्गदर्शक की तरह रहे। नेट्स पर अभ्यास के दौरान घंटों पसीना बहाना और युवा गेंदबाजों को यह सिखाना कि किस बल्लेबाज के सामने क्या फील्ड सेट की जाए और गेंद की सीम को कैसे पकड़ा जाए, शमी की दिनचर्या का हिस्सा था। मोर्कल ने कहा कि शमी ने कभी भी अपनी कला को अपने तक सीमित नहीं रखा। जब भी कोई नया गेंदबाज टीम में आता था, शमी खुद आगे बढ़कर उससे बात करते थे और टेस्ट क्रिकेट के मानसिक दबाव से निपटने के गुर सिखाते थे। उन्होंने भारतीय तेज गेंदबाजी यूनिट में निस्वार्थ भाव से एक-दूसरे की सफलता का जश्न मनाने का जो कल्चर तैयार किया, वह भारतीय क्रिकेट को आने वाले कई दशकों तक मजबूती देता रहेगा।
शरीर का सम्मान और सीमित ओवरों पर फोकस: कोच ने ठहराया सही फैसला
मोहम्मद शमी के संन्यास के फैसले के पीछे के कारणों पर बात करते हुए कोच ने कहा कि 34-35 वर्ष की आयु में तेज गेंदबाजों के लिए टेस्ट प्रारूप की शारीरिक मांग को पूरा करना बेहद कठिन हो जाता है। 2023 वनडे विश्व कप के दौरान चोटिल होने के बाद शमी ने जिस तरह की सर्जरी और लंबे रिहैबिलिटेशन का सामना किया, वह किसी भी खिलाड़ी के मानसिक और शारीरिक धैर्य की कड़ी परीक्षा होती है। टेस्ट मैच में दिन भर में 20 से 25 ओवर फेंकना और लगातार पांच दिनों तक मैदान पर मुस्तैद रहना रीढ़, टखने और घुटनों पर भारी दबाव डालता है। मोर्कल ने कहा कि शमी ने अपने शरीर की पुकार सुनी और समय रहते यह समझदारी भरा फैसला लिया। टेस्ट क्रिकेट से हटने का यह मतलब कतई नहीं है कि शमी का अंतरराष्ट्रीय करियर खत्म हो गया है। सीमित ओवरों के क्रिकेट यानी वनडे और टी20 में शमी की घातक यॉर्कर और शुरुआती ओवरों की धार अभी भी भारत के लिए सबसे बड़ा हथियार है। टेस्ट से संन्यास लेने से उनका वर्कलोड संतुलित रहेगा और वे आगामी आईसीसी प्रतियोगिताओं, चैंपियंस ट्रॉफी और विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंटों में पूरी तरह तरोताजा और फिट होकर टीम इंडिया को जीत दिला सकेंगे।
लाल गेंद से शमी की विदाई: एक अमर विरासत जो हमेशा प्रेरणा देगी
भारतीय गेंदबाजी कोच ने अपने बयान का समापन करते हुए कहा कि भारतीय टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में जब भी तेज गेंदबाजी की स्वर्णिम क्रांति का जिक्र होगा, मोहम्मद शमी का नाम कपिल देव, जवागल श्रीनाथ और जसप्रीत बुमराह के साथ पहली पंक्ति में बड़े सम्मान के साथ लिया जाएगा। शमी ने यह साबित करके दिखाया कि उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से निकलकर, तमाम पारिवारिक और शारीरिक संघर्षों को झेलते हुए भी दुनिया का सबसे खूंखार टेस्ट गेंदबाज बना जा सकता है। मोर्कल ने कहा कि पूरी टीम, कोचिंग स्टाफ और देश के करोड़ों क्रिकेट प्रशंसक शमी के 13 वर्षों के टेस्ट योगदान के प्रति कृतज्ञ हैं। अब भारतीय तेज गेंदबाजी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि शमी द्वारा खाली की गई उस नई गेंद और पुरानी गेंद की जिम्मेदारी को कौन सा युवा खिलाड़ी अपने कंधों पर उठाता है। शमी भले ही अब टेस्ट मैचों में सफेद जर्सी पहने नजर न आएं, लेकिन लाल गेंद से लिखी गई उनकी दास्तान हमेशा भारतीय क्रिकेट का गौरव बनी रहेगी।