मोदी के गढ़ काशी में भाजपा को करारा झटका: सपा ने जीती वाराणसी शिक्षक एमएलसी सीट, स्नातक पर भी बनाई बड़ी बढ़त
उत्तर प्रदेश विधान परिषद के द्विवार्षिक चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से भारतीय जनता पार्टी के लिए एक चौंकाने वाला और बड़ा सियासी झटका सामने आया है। वाराणसी खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार लाल बिहारी यादव ने सत्ताधारी दल भाजपा के प्रत्याशी डॉ. प्रमोद कुमार मिश्रा को भारी मतों के अंतर से शिकस्त देकर अपनी सीट पर कब्जा बरकरार रखा है। शिक्षक सीट पर मिली इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही वाराणसी खंड स्नातक निर्वाचन सीट पर भी समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी आशुतोष सिन्हा ने भाजपा के कद्दावर नेता केदारनाथ सिंह के खिलाफ मजबूत बढ़त बना ली है। काशी की दोनों प्रतिष्ठित सीटों पर साइकिल की यह रफ्तार केवल एक स्थानीय चुनाव परिणाम नहीं है, बल्कि इसने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक हलचल पैदा कर दी है।
वाराणसी के पहड़िया मंडी स्थित मतगणना केंद्र पर मंगलवार की सुबह से शुरू हुई वोटों की गिनती के दौरान पहले ही चरण से समाजवादी पार्टी के पक्ष में माहौल बनता दिख रहा था। शिक्षक निर्वाचन में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी लाल बिहारी यादव ने प्रथम वरीयता के मतों में ही अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा के डॉ. प्रमोद कुमार मिश्र पर चार हजार से अधिक मतों की निर्णायक बढ़त बना ली थी। मतगणना के कड़े नियमों और वरीयता क्रम की जांच के बाद जब परिणाम पूरी तरह स्पष्ट हुआ, तो पहड़िया मंडी के बाहर मौजूद सपा कार्यकर्ताओं का उत्साह चरम पर पहुंच गया। पार्टी कार्यकर्ताओं ने अबीर-गुलाल उड़ाकर और मिठाइयां बांटकर इस जीत को शिक्षकों और प्रबुद्ध वर्ग का जनादेश बताया।
आंकड़ों की जुबानी: लाल बिहारी यादव ने कैसे दी भाजपा को मात?
वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में पड़े मतों का आधिकारिक विश्लेषण बताता है कि समाजवादी पार्टी के पक्ष में शिक्षक समुदाय का किस कदर एकतरफा ध्रुवीकरण हुआ। शिक्षक सीट पर जीत तय करने के लिए निर्धारित कोटे के तहत 11,472 मतों की दरकार थी। सपा के लाल बिहारी यादव को पहले चरण में 6,941 और दूसरे चरण में 4,017 मत प्राप्त हुए, जिससे उनके कुल वोटों का आंकड़ा 10,958 तक पहुंच गया। वहीं दूसरी तरफ, भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी डॉ. प्रमोद कुमार मिश्र को पहले चरण में 3,005 और दूसरे चरण में 3,055 वोट मिले, जिससे वे कुल 6,060 मतों पर ही सिमट कर रह गए।
प्रथम वरीयता में ही सपा प्रत्याशी ने भाजपा पर 4,898 वोटों का भारी-भरकम अंतर बना लिया था। इस चुनाव में शिक्षक राजनीति के पुराने दिग्गज और पूर्व एमएलसी चेतनारायण सिंह भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में डटे थे, जिन्हें 3,111 वोट मिले। इसके अलावा डॉ. जितेंद्र कुमार सिंह पटेल को 1,088, सुधांशु शेखर त्रिपाठी को 533, ऋतिका दुबे को 450, संजय राय प्रियदर्शी को 310, धर्मेंद्र कुमार यादव को 182, डॉ. फरीद अंसारी को 152 और अवधेश सिंह को 108 वोट प्राप्त हुए। चुनाव में कुल 1,441 मतपत्र अवैध घोषित किए गए। प्रथम वरीयता में निर्धारित कोटा पूरा न होने के चलते द्वितीय वरीयता के मतों की गणना कराई गई, जिसमें लाल बिहारी यादव की जीत पर औपचारिक मुहर लग गई।
स्नातक सीट पर भी सपा का दबदबा: आशुतोष सिन्हा ने बनाई हजारों की लीड
शिक्षक सीट जीतने के बाद सबकी निगाहें वाराणसी खंड स्नातक सीट पर टिकी हैं, जहां समाजवादी पार्टी के निवर्तमान एमएलसी आशुतोष सिन्हा ने भाजपा के अनुभवी नेता केदारनाथ सिंह के खिलाफ लगातार बढ़त कायम रखी है। स्नातक सीट के लिए मतपत्रों के मिलान, बंडल बनाने और वैध-अवैध मतों की छंटनी की प्रक्रिया करीब 13 घंटे तक चली, जिसके बाद मतगणना टेबल पर वोटों की गिनती शुरू हुई। 14 टेबलों पर दो पालियों में चल रही मतगणना में आशुतोष सिन्हा ने पहले राउंड से ही अपनी बढ़त का सिलसिला शुरू किया।
पहले राउंड में आशुतोष सिन्हा को 5,184 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के केदारनाथ सिंह को 3,734 वोट प्राप्त हुए। दूसरे राउंड में भी सपा प्रत्याशी का जलवा बरकरार रहा, जहां आशुतोष को 5,235 और केदारनाथ सिंह को 3,740 मत हासिल हुए। दो चक्रों की गिनती के बाद आशुतोष सिन्हा के कुल मतों का आंकड़ा 10,419 पर पहुंच गया, जबकि केदारनाथ सिंह 7,474 वोटों पर थे। करीब तीन हजार से अधिक मतों की इस शुरुआती बढ़त के बाद तीसरे राउंड में यह अंतर बढ़कर 4,500 के पार निकल गया। स्नातक सीट पर कुल 24 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला पूरी तरह सपा और भाजपा के बीच ही केंद्रित नजर आ रहा है।
पूर्वांचल के 8 जिलों का मिजाज: काशी से बलिया तक फैला है कार्यक्षेत्र
वाराणसी खंड निर्वाचन क्षेत्र कोई छोटा चुनावी इलाका नहीं है, बल्कि यह पूर्वांचल के आठ महत्वपूर्ण जिलों में फैला हुआ एक विशाल शैक्षणिक और बौद्धिक दायरा है। इस निर्वाचन क्षेत्र के तहत प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र वाराणसी, चंदौली, गाजीपुर, जौनपुर, बलिया, मिर्जापुर, भदोही और सोनभद्र जिले आते हैं। इन आठों जिलों में कुल 453 मतदान केंद्र बनाए गए थे, जहां 23 अक्टूबर को मतदान संपन्न हुआ था।
आंकड़ों के अनुसार, स्नातक निर्वाचन के लिए पंजीकृत 2.88 लाख मतदाताओं में से 1,18,611 (41.11 प्रतिशत) मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। वहीं शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में 34,900 पंजीकृत शिक्षक मतदाताओं में से 24,384 शिक्षकों (69.87 प्रतिशत) ने वोट डाले थे। पूर्वांचल के इस बौद्धिक वर्ग में वित्तविहीन शिक्षक, सहायता प्राप्त (एडेड) माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षक, डिग्री कॉलेजों के प्राध्यापक और हजारों युवा स्नातक शामिल हैं। आठ जिलों के इस सामूहिक जनादेश ने यह संदेश दिया है कि सरकारी कर्मचारी और शिक्षक वर्ग सरकार की कई नीतियों से असंतुष्ट चल रहा है।
'पुरानी पेंशन' और वित्तविहीन शिक्षकों का गुस्सा: भाजपा से कहां हुई चूक?
इस चुनाव परिणाम के राजनीतिक और प्रशासनिक कारणों का विश्लेषण किया जाए, तो सबसे बड़ा मुद्दा पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली का रहा है। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान समाजवादी पार्टी ने शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच पुरानी पेंशन के मुद्दे को सबसे प्रमुखता से उठाया। शिक्षक नेता के रूप में लंबे समय से संघर्षरत लाल बिहारी यादव ने वित्तविहीन माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों के मानदेय, तदर्थ शिक्षकों के विनियमितीकरण और अशासकीय विद्यालयों की सेवा सुरक्षा के सवालों को सीधे सरकार के सामने रखा।
इसके विपरीत, भाजपा का पूरा प्रचार तंत्र डबल इंजन सरकार के विकास कार्यों, कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित रहा, जो शिक्षक मतदाताओं को पूरी तरह प्रभावित नहीं कर सका। शिक्षकों में इस बात को लेकर नाराजगी थी कि उनके वेतन, सेवा शर्तों और पेंशन को लेकर सरकार की ओर से कोई ठोस नीतिगत घोषणा नहीं की गई। इसके अतिरिक्त, मदरसों के आधुनिक शिक्षकों का बकाया मानदेय और संस्कृत विद्यालयों के शिक्षकों की उपेक्षा का मामला भी सपा के पक्ष में लामबंदी का बड़ा आधार बना। जीत दर्ज करने के बाद लाल बिहारी यादव ने भी बयान दिया कि यह जीत किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि शिक्षकों के अधिकारों और उनके हक की लड़ाई की जीत है।
यूपी की सियासत पर असर: 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए क्या हैं संकेत?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में एमएलसी चुनाव का यह नतीजा भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक ढांचे के लिए आत्ममंथन का विषय बन गया है। वाराणसी को भाजपा का सबसे अभेद्य किला माना जाता रहा है, जहां लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पार्टी का दबदबा निर्विवाद रहा है। लेकिन प्रबुद्ध, शिक्षित और नौकरीपेशा मतदाताओं के बीच सपा की यह लगातार दूसरी जीत दर्शाती है कि स्थानीय और नीतिगत स्तर पर असंतोष की परतें मौजूद हैं।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा चलाए जा रहे सामाजिक न्याय, पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और कर्मचारी हितों के अभियान को इस जीत से नई ऊर्जा मिली है। शिक्षित वर्ग, जिसमें पीएचडी, परास्नातक और डिग्री धारक मतदाता शामिल हैं, का सपा के पक्ष में झुकना यह साबित करता है कि विपक्षी गठबंधन केवल पारंपरिक वोट बैंक तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले वाराणसी का यह परिणाम प्रदेश की राजनीति में नैरेटिव की जंग को और अधिक तीखा बनाएगा।