इंडिया ब्लॉक की बैठक से अखिलेश यादव ने बनाई दूरी, तो DMK ने खोला अंदर का राज
देश की राजधानी दिल्ली में बुधवार (30 सितंबर) को विपक्षी 'इंडिया ब्लॉक' (INDIA Bloc) की एक बेहद महत्वपूर्ण और उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की जा रही है। इस बैठक में चुनाव आयोग, मतदाता सूची और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्षी दलों की साझा रणनीति पर मंथन होना है। हालांकि, बैठक से ठीक पहले समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा इसमें व्यक्तिगत रूप से शामिल न होने के फैसले ने सियासी गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है। अखिलेश यादव के इस कदम के बाद जहां कांग्रेस खेमे में बेचैनी बढ़ गई है, वहीं गठबंधन के प्रमुख सहयोगी दल द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने सामने आकर इस पूरे घटनाक्रम की अंदरूनी हकीकत बयां की है। डीएमके के इस बेबाक बयान ने यह साफ कर दिया है कि विपक्षी खेमे में सब कुछ उतना सहज नहीं है जितना कि ऊपर से दिखाई देता है।
अखिलेश यादव की गैरमौजूदगी पर डीएमके का चौंकाने वाला बयान
अखिलेश यादव के बैठक से किनारा करने पर डीएमके के वरिष्ठ नेता और पार्टी प्रवक्ता टीकेएस एलंगोवन ने खुलकर प्रतिक्रिया दी है। एलंगोवन ने साफ शब्दों में कहा कि अखिलेश यादव के खुद इस बैठक में न आने से विपक्षी गठबंधन पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ने वाला है। उन्होंने गठबंधन की जमीनी हकीकत उजागर करते हुए कहा कि आज भी कई क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस के साथ सीधे मंच साझा करने या उसके साथ पूरी तरह खड़े होने में असहज महसूस करती हैं। कई दलों को कांग्रेस के नेतृत्व के साथ चलने में एक हिचक है। एलंगोवन के अनुसार, बैठक का एजेंडा पहले से तय है और हर दल को मालूम है कि किन मुद्दों पर चर्चा होनी है। ऐसे में किसी शीर्ष नेता का व्यक्तिगत रूप से वहां उपस्थित होना अब महज एक औपचारिकता बनकर रह गया है; मुख्य बात भाजपा के विरोध में वैचारिक एकजुटता की है।
क्या पूरी तरह एकजुट नहीं दिख रहा इंडिया गठबंधन?
डीएमके प्रवक्ता ने गठबंधन के आंतरिक विरोधाभासों पर बात करते हुए यह भी स्वीकार किया कि इंडिया ब्लॉक पूरी तरह से स्थिर और अटूट इकाई के रूप में नजर नहीं आ रहा है। कई क्षेत्रीय पार्टियों ने पूर्व में भी कांग्रेस की चुनावी रणनीति और कार्यशैली पर गंभीर सवाल और आपत्तियां जताई हैं। राज्यों के स्तर पर क्षेत्रीय नेतृत्व अपने जनाधार को लेकर बेहद सतर्क रहता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि तमिलनाडु से लेकर उत्तर भारत तक, क्षेत्रीय दलों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं। यही कारण है कि जब शीर्ष नेतृत्व की बैठकों का दौर शुरू होता है, तो कई दल सीधे तौर पर दबाव की राजनीति से बचने के लिए अपने दूसरे दर्जे के प्रतिनिधियों को भेजकर औपचारिकता पूरी कर लेते हैं।
व्यस्तता का आधिकारिक हवाला या सीट शेयरिंग से बचने का दांव?
सपा की ओर से दिए गए आधिकारिक बयान में कहा गया है कि अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में आगामी राज्यसभा चुनाव और उम्मीदवारों के चयन की तैयारियों में अत्यधिक व्यस्त हैं, जिसके चलते वे दिल्ली नहीं जा पा रहे हैं। उनकी जगह पार्टी का कोई वरिष्ठ प्रतिनिधि इस बैठक में शिरकत करेगा। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल एक बहाना मान रहे हैं। सियासी हलकों में चर्चा है कि कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को ध्यान में रखते हुए अभी से सीट बंटवारे (Seat Sharing) की बातचीत को फाइनल करने का दबाव बना रही है। कांग्रेस के कई नेता लगातार जल्द समझौते की वकालत कर रहे हैं, जबकि अखिलेश यादव अभी इस चर्चा में उलझने के बजाय अपनी शर्तों पर आगे बढ़ना चाहते हैं। अगर अखिलेश यादव दिल्ली की बैठक में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ मंच साझा करते, तो मीडिया और राजनीतिक गलियारों में सारा ध्यान एजेंडे से हटकर यूपी में सीट शेयरिंग के विवाद पर केंद्रित हो जाता।
यूपी की जमीन पर कांग्रेस-सपा का टकराव और भविष्य की राह
उत्तर प्रदेश के भीतर समाजवादी पार्टी खुद को मुख्य विपक्षी शक्ति मानती है और लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी का आत्मविश्वास काफी ऊंचा है। ऐसे में अखिलेश यादव कांग्रेस को राज्य की सियासत में अधिक स्पेस देने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। दोनों दलों के बीच उपजे इस ताजा तनाव के बीच डीएमके के बयान ने आग में घी डालने का काम किया है। डीएमके ने यह मानकर कि सहयोगी दलों में कांग्रेस को लेकर हिचक है, विपक्षी गठबंधन की आंतरिक दरारों पर मुहर लगा दी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बुधवार को दिल्ली में होने वाली बैठक में सपा के प्रतिनिधि का क्या रुख रहता है और क्या कांग्रेस अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को संतुष्ट कर एकजुट रख पाने में सफल हो पाती है या नहीं।