लगातार बारिश से गंगा एक्सप्रेसवे के किनारों की मिट्टी धंसी, पक्की नालियों में आईं दरारें
उत्तर प्रदेश सरकार के ड्रीम इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शुमार महत्वाकांक्षी गंगा एक्सप्रेसवे के निर्माण कार्य को लेकर हालिया मानसूनी बारिश ने बड़ी चिंता खड़ी कर दी है। राज्य के कई हिस्सों में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के चलते गंगा एक्सप्रेसवे के किनारों (स्लोप) की मिट्टी बड़े पैमाने पर खिसक कर नीचे आ गई है। कई स्थानों पर पानी की तेज निकासी न हो पाने के कारण एक्सप्रेसवे के दोनों तरफ बनाई जा रही सीमेंटेड नालियां धंस गईं और उनमें गहरी दरारें पड़ गई हैं। जमीन धंसने और दरारें आने की तस्वीरें सामने आते ही निर्माण एजेंसियों, तकनीकी सलाहकारों और उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPEIDA) के अधिकारियों में हड़कंप मच गया है। मेरठ से प्रयागराज को जोड़ने वाले इस 594 किलोमीटर लंबे आधुनिक एक्सप्रेसवे पर निर्माण की गुणवत्ता को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और राहगीरों ने गंभीर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
बारिश का कहर और एक्सप्रेसवे के किनारों की मिट्टी का कटान
स्थानीय स्तर पर उन्नाव, हरदोई, रायबरेली और शाहजहांपुर से गुजरने वाले पैकेजों के कई हिस्सों में पिछले कुछ दिनों से रुक-रुक कर भारी बारिश हो रही है। मिट्टी के ऊंचे तटबंधों (एम्बैंकमेंट) पर हाल ही में की गई मिट्टी की भराई पानी के तेज बहाव को झेल नहीं पाई। बारिश का पानी स्लोप से नीचे बहने के कारण बड़े-बड़े गड्ढे बन गए और सैकड़ों टन मिट्टी बहकर सर्विस रोड व आसपास के खेतों में जा घुसी। तकनीकी जानकारों का कहना है कि स्लोप प्रोटेक्शन के लिए जो जियो-टेक्सटाइल नेटिंग और घास रोपने (टर्फिंग) का काम पूरा होना चाहिए था, वह कई जगहों पर अधूरा रह गया था। मिट्टी की सही तरीके से रोलिंग और कॉम्पेक्शन न होने की वजह से पानी रिसकर अंदर चला गया, जिसके परिणामस्वरूप मिट्टी का एक बड़ा हिस्सा भरभराकर नीचे खिसक गया।
पक्की नालियों में दरारें और पानी निकासी का संकट
एक्सप्रेसवे के निर्माण मानकों के अनुसार, भारी बारिश के दौरान पानी को मुख्य कैरिजवे से सुरक्षित बाहर निकालने के लिए दोनों ओर कंक्रीट की ड्रेनेज नालियां बनाई जाती हैं। हालांकि, मिट्टी धंसने के साथ ही इन पक्की नालियों का बेस हिल गया, जिससे नालियों के बीच भारी दरारें आ गईं और कई मीटर तक कंक्रीट टूटकर लटक गई। यदि समय रहते इन दरारों और ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त नहीं किया गया, तो बारिश का पानी सीधे एक्सप्रेसवे की मुख्य सड़क के बेस (सब-ग्रेड) तक पहुंच सकता है, जिससे मुख्य हाईवे के धंसने का खतरा पैदा हो सकता है। स्थानीय किसानों का यह भी आरोप है कि एक्सप्रेसवे की नालियों का पानी सही ढंग से प्राकृतिक नालों में न छोड़े जाने के कारण आसपास की फसलों में जलभराव हो गया है, जिससे किसानों की फसलें भी प्रभावित हुई हैं।
यूपीडा की टीम मौके पर पहुंची, निर्माण एजेंसियों को सख्त निर्देश
मिट्टी कटान और दरारों की जानकारी मिलते ही यूपीडा के वरिष्ठ इंजीनियरों और स्वतंत्र तकनीकी कंसल्टेंट्स की टीमों ने प्रभावित स्थलों का मुआयना किया। संबंधित निर्माण एजेंसियों और ठेकेदारों को तुरंत युद्धस्तर पर मरम्मत कार्य शुरू करने के कड़े निर्देश जारी किए गए हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि एक्सप्रेसवे अभी निर्माण और फिनिशिंग के विभिन्न चरणों में है और निर्माण एजेंसियों की यह कानूनी व अनुबंधीय जिम्मेदारी (डिफेक्ट लायबिलिटी) है कि वे किसी भी तरह की खामी को अपने खर्चे पर तुरंत ठीक करें। मौके पर जेसीबी और डंपर लगाकर बोल्डर पिचिंग (पत्थरों की चुनाई) और सैंड बैग्स (रेत की बोरियों) की मदद से मिट्टी के कटान को रोकने का काम शुरू कर दिया गया है। साथ ही क्षतिग्रस्त नालियों को तोड़कर नए सिरे से मजबूत कंक्रीट बेस के साथ ढालने का काम किया जा रहा है।
आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और मानसूनी चुनौतियों का समाधान
आधुनिक सिविल इंजीनियरिंग में बारिश के दौरान एक्सप्रेसवे के स्लोप का कटना एक जानी-पहचानी चुनौती है, लेकिन इसका समय पर समाधान न होना लापरवाही की श्रेणी में आता है। गंगा एक्सप्रेसवे को पर्यावरण के अनुकूल और अत्याधुनिक मानकों पर तैयार किया जा रहा है, ताकि इस पर 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गाड़ियां दौड़ सकें। ऐसे में सुरक्षा मानकों से किसी भी प्रकार का समझौता भविष्य में बड़े हादसों का कारण बन सकता है। स्थानीय लोगों की मांग है कि पूरे स्ट्रेच पर थर्ड-पार्टी क्वालिटी ऑडिट कराया जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मिट्टी भराव और ड्रेनेज सिस्टम तय सरकारी मानकों के अनुरूप ही बनाया गया है। यूपीडा ने भरोसा दिलाया है कि पूरी जांच के बाद ही सड़क को यातायात के लिए पूरी तरह हरी झंडी दी जाएगी।