बैंकों में अचानक गहराया नकदी संकट: कुछ ही हफ्तों में ₹10.54 लाख करोड़ का सरप्लस कैश हुआ गायब

बैंकों में अचानक गहराया नकदी संकट: कुछ ही हफ्तों में ₹10.54 लाख करोड़ का सरप्लस कैश हुआ गायब

भारतीय वित्तीय बाजार में इस समय एक ऐसी खामोश हलचल मची हुई है जिसने केंद्रीय बैंक से लेकर आम खाताधारकों तक के कान खड़े कर दिए हैं। देश के बैंकिंग सिस्टम में कुछ ही हफ्ते पहले तक जो नकदी जरूरत से ज्यादा तैर रही थी, वह अब तेजी से सूख चुकी है। आधिकारिक और बाजार के ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो कुछ ही हफ्तों के भीतर लगभग 10.54 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम सरप्लस लिक्विडिटी स्तर बैंकिंग तंत्र से बाहर निकल गया है। वित्तीय गलियारों में इसे एक दुर्लभ और तेज मोड़ माना जा रहा है क्योंकि लिक्विडिटी का इतनी तेज गति से कम होना सीधे तौर पर बाजार में ब्याज दरों और कर्ज की उपलब्धता को प्रभावित करता है। बैंक प्रबंधकों से लेकर खजाना विभाग के प्रमुखों तक हर कोई इस वक्त अपने दैनिक नकदी संतुलन को साधने में जुटा हुआ है। जिस नकदी को बैंक आसानी से रिजर्व बैंक के पास पार्क करके मुनाफा कमा रहे थे, अब उसी नकदी के लिए बैंकों को इंटरबैंक मार्केट और लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी की खिड़की पर कतार लगानी पड़ रही है। इस बदलाव ने पूरी वित्तीय व्यवस्था की नब्ज को झकझोर कर रख दिया है।

आखिर कहां चला गया ₹10.54 लाख करोड़ का भारी सरप्लस

बैंकिंग प्रणाली से इतनी भारी मात्रा में नकदी का बाहर जाना किसी एक कारक का नतीजा नहीं है, बल्कि कई वित्तीय चक्रों के एक साथ टकराने की वजह से यह स्थिति पैदा हुई है। सबसे बड़ा तात्कालिक झटका अग्रिम कर (एडवांस टैक्स) और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के बड़े भुगतान चक्र से लगा है। जब कॉर्पोरेट्स और आम व्यापारी अपने करों का भुगतान करते हैं, तो वाणिज्यिक बैंकों के खातों से अरबों रुपये निकलकर सीधे सरकार के भारतीय रिजर्व बैंक स्थित खाते में जमा हो जाते हैं। जब तक सरकार इस पैसे को विभिन्न विकास परियोजनाओं, वेतन और जन कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से वापस अर्थव्यवस्था में खर्च नहीं करती, तब तक यह पैसा बैंकिंग लिक्विडिटी सिस्टम से पूरी तरह गायब रहता है। इसके साथ ही त्योहारी सीजन और कृषि मंडियों की गतिविधियों के चलते ग्रामीण व शहरी दोनों ही क्षेत्रों में करेंसी इन सर्कुलेशन यानी लोगों के हाथों में नकदी रखने की मांग में भारी उछाल दर्ज किया गया है। जब लोग एटीएम और बैंक शाखाओं से नकदी निकालकर अपने पास रखते हैं, तो बैंकों की जमा पूंजी का आधार अस्थायी रूप से सिकुड़ जाता है। इसके अलावा विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली और आयातकों द्वारा डॉलर की बढ़ती मांग को संतुलित करने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में जो हस्तक्षेप हुए, उसने भी घरेलू मुद्रा की तरलता को खींचने का काम किया।

रिजर्व बैंक की सख्त नीतियां और मुद्रास्फीति का मोर्चा

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति और मुद्रा प्रबंधन रणनीति इस नकदी संकट का एक और अहम पहलू है। मुद्रास्फीति यानी महंगाई को निर्धारित दायरे में बांधे रखने के लिए केंद्रीय बैंक लंबे समय से सतर्क रुख अपनाए हुए है। जब सिस्टम में बहुत अधिक नकदी तैरती रहती है, तो मुद्रास्फीति का जोखिम हमेशा बना रहता है। केंद्रीय बैंक ने बाजार से गैर-जरूरी तरलता को सोखने के लिए रिवर्स रेपो ऑपरेशंस और ओपन मार्केट ऑपरेशंस जैसे पारंपरिक हथियारों का सटीक इस्तेमाल किया। कई विश्लेषकों का मानना है कि केंद्रीय बैंक यह कतई नहीं चाहता था कि अत्यधिक नकदी की वजह से ओवरनाइट मनी मार्केट में दरें नीतिगत रेपो रेट से नीचे फिसल जाएं। दरें रेपो रेट के आसपास मजबूती से टिकी रहें, इसे सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय बैंक ने नकदी की आपूर्ति को बेहद नपे-तुले अंदाज में नियंत्रित किया। हालांकि, जिस गति से टैक्स आउटफ्लो और करेंसी निकासी हुई, उसने इस तरलता को उस स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया जहां अब सरप्लस की जगह डेफिसिट यानी घाटे की आहट सुनाई देने लगी है। केंद्रीय बैंक अब दैनिक आधार पर स्थिति की निगरानी कर रहा है ताकि व्यवस्था में अचानक घबराहट का माहौल न बने।

आपके लोन की ईएमआई और एफडी रिटर्न पर सीधा प्रभाव

जब बैंकों के पास नकदी की किल्लत होती है, तो उसका सीधा असर सड़क पर चलने वाले आम नागरिक, होम लोन धारक और छोटे व्यवसायियों पर पड़ता है। लिक्विडिटी की कमी का मतलब है कि बैंकों के लिए फंड जुटाने की लागत यानी 'कॉस्ट ऑफ फंड्स' बढ़ जाती है। जब बैंक इंटरबैंक कॉल मनी मार्केट से महंगे दामों पर पैसा उठाते हैं, तो वे इसका बोझ अंततः नए कर्जदारों पर डालते हैं। इसका पहला परिणाम यह हो सकता है कि बैंक आने वाले दिनों में मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) में बढ़ोतरी कर सकते हैं, जिससे पर्सनल लोन, ऑटो लोन और बिजनेस लोन की ईएमआई महंगी हो सकती है। लेकिन इस सिक्के का एक दूसरा सकारात्मक पहलू भी है जो वरिष्ठ नागरिकों और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए राहत भरा हो सकता है। नकदी जुटाने के लिए बैंकों के बीच आम जनता से फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और टर्म डिपॉजिट हासिल करने की होड़ शुरू हो जाती है। जब बैंकों को फंड की सख्त जरूरत होती है, तो वे ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अपनी सावधि जमा योजनाओं पर ब्याज दरों में आकर्षक वृद्धि करते हैं। ऐसे में जो निवेशक सुरक्षित और बेहतर रिटर्न की तलाश में हैं, उनके लिए एफडी के नए अवसरों का द्वार खुलता दिख रहा है।

मुंबई से लखनऊ तक बाजार और एमएसएमई सेक्टर की चिंता

वित्तीय राजधानी मुंबई के नरीमन पॉइंट और बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स से लेकर उत्तर भारत के औद्योगिक केंद्रों लखनऊ, कानपुर और नोएडा तक इस लिक्विडिटी क्रंच की धमक महसूस की जा रही है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) किसी भी देश की आर्थिक रीढ़ होते हैं और वे अपने दैनिक कामकाज के लिए बैंकों की वर्किंग कैपिटल लिमिट और कैश क्रेडिट फैसिलिटी पर निर्भर करते हैं। जब बैंकों की अपनी तिजोरी में नकदी का दबाव बढ़ता है, तो वे नए लोन बांटने में अत्यधिक सतर्कता बरतने लगते हैं। लोन प्रोसेसिंग में अतिरिक्त समय लगना, क्रेडिट असेसमेंट को कड़ा करना और शॉर्ट-टर्म क्रेडिट पर सख्त शर्तें लगाना बैंकों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है। लखनऊ और आसपास के व्यापारिक बाजारों में कारोबारियों का कहना है कि फेस्टिव सीजन के बाद पेमेंट साइकल पहले से ही कुछ धीमी गति से चल रही थी, और अब बैंकों से आसान लिक्विडिटी का अभाव सप्लाई चेन के लिए नई बाधाएं खड़ी कर सकता है। गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) के लिए भी यह समय चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है क्योंकि वे बैंकों से थोक दर पर कर्ज लेकर आगे छोटे रिटेल ग्राहकों को बांटती हैं। बैंकों द्वारा फंड्स सीमित किए जाने से एनबीएफसी की फंडिंग लागत पर भी दबाव बढ़ रहा है।

आगे का रास्ता और बाजार को लिक्विडिटी इंफ्यूजन की उम्मीद

वित्तीय बाजार के जानकार और अर्थशास्त्री मानते हैं कि नकदी की यह मौजूदा किल्लत बहुत लंबे समय तक नहीं खिंचेगी, बशर्ते कि सरकारी खजाने से खर्च की गति तेज हो। जैसे ही सरकार विभिन्न मंत्रालयों, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और राज्यों को दिए जाने वाले फंड का वितरण शुरू करेगी, सिस्टम में बंद पड़ा सरकारी पैसा दोबारा बैंकों के जरिए सर्कुलेशन में लौटने लगेगा। इसके अतिरिक्त, बाजार अब पूरी उम्मीद भरी निगाहों से भारतीय रिजर्व बैंक की ओर देख रहा है कि वह तरलता प्रबंधन के लिए वेरिएबल रेट रेपो (VRR) ऑपरेशंस का दायरा बढ़ाए। केंद्रीय बैंक के पास हमेशा यह विकल्प रहता है कि वह लघु अवधि के रेपो टेंडर्स के जरिए बैंकिंग तंत्र में ताजी नकदी का संचार करे ताकि कॉल मनी रेट्स अपनी तय सीमाओं के भीतर बनी रहें। यदि आगामी हफ्तों में मुद्रास्फीति के आंकड़े स्थिर रहते हैं, तो केंद्रीय बैंक का रुख तरलता को लेकर थोड़ा अधिक नरम हो सकता है। मौजूदा घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि मैक्रोइकॉनॉमिक्स केवल किताबों की बात नहीं है, बल्कि वित्तीय आंकड़ों में आने वाला कुछ लाख करोड़ का उतार-चढ़ाव सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था, ब्याज दरों और आम जनता के मासिक बजट की दिशा तय करता है।