Yes Bank का मुनाफा 65% उछलकर ₹1,080 करोड़ पहुंचा, फिर भी औंधे मुंह क्यों गिरे शेयर?
भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के निजी दिग्गज यस बैंक (Yes Bank) ने वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी कर दिए हैं। बैंक के आंकड़ों को पहली नजर में देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि बैंक वित्तीय संकट के दौर को पीछे छोड़कर बेहद मजबूत स्थिति में लौट चुका है। चालू वित्त वर्ष की सितंबर तिमाही में यस बैंक का स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 65 प्रतिशत की भारी उछाल के साथ ₹1,080 करोड़ के आंकड़े को छू गया है, जो पिछले साल की समान तिमाही में मात्र ₹654 करोड़ रहा था। बैंक की शुद्ध ब्याज आय (NII) में भी 22.7 फीसदी की मजबूत बढ़त दर्ज की गई और यह ₹2,822 करोड़ पर पहुंच गई। इसके अलावा फंसे हुए कर्जों के लिए किए जाने वाले प्रोविजन में 24.2 प्रतिशत की कमी आई और बैंक का ग्रॉस एनपीए सुधरकर 1.2 फीसदी पर आ गया। इन सभी मजबूत बुनियादी आंकड़ों के बावजूद सोमवार को जब शेयर बाजार खुला, तो यस बैंक के शेयरों में खरीदारी की जगह भारी बिकवाली देखने को मिली और शेयर लुढ़ककर ₹17 के स्तर के आसपास कारोबार करने लगे। इस विरोधाभासी स्थिति ने खुदरा निवेशकों के साथ-साथ बाजार के जानकारों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर इतने शानदार नतीजों के बाद भी यस बैंक के शेयर में गिरावट का रुख क्यों बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट का ₹8,415 करोड़ के AT-1 बॉन्ड पर फैसला बना सबसे बड़ा सिरदर्द
यस बैंक के शेयरों में आई इस अचानक गिरावट की मुख्य वजह कंपनी के बुनियादी कारोबारी आंकड़े नहीं, बल्कि कानूनी गलियारों से आया एक बड़ा फैसला है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली अपीलों को खारिज कर दिया, जिसमें साल 2020 के बेलआउट पैकेज के दौरान यस बैंक द्वारा ₹8,415 करोड़ मूल्य के एडिशनल टियर-1 (AT-1) बॉन्ड्स को बट्टे खाते यानी राइट-ऑफ करने के निर्णय को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से यस बैंक के सामने एक बहुत बड़ी देनदारी और कानूनी संकट खड़ा हो गया है। बॉन्डहोल्डर्स, जिनमें कई वित्तीय संस्थान और व्यक्तिगत निवेशक शामिल थे, उनके पक्ष में फैसला जाने के बाद बैंक को इन बॉन्ड्स की मान्यता बहाल करनी पड़ सकती है या इसका भुगतान करना पड़ सकता है। वित्तीय विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि अदालत का यह निर्णय बैंक की बैलेंस शीट पर गहरा असर डाल सकता है, और यही वह 'काला बादल' है जो 65% मुनाफे की चमक पर भारी पड़ गया है।
बैलेंस शीट पर ₹5,217 करोड़ के भारी नुकसान का खतरा
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के वित्तीय असर का यस बैंक द्वारा किए गए आंतरिक मूल्यांकन के अनुसार, यदि इस फैसले के तहत देनदारी को पूरी तरह से मान्यता दी जाती है, तो बैंक को लगभग ₹5,217 करोड़ का अप्रत्याशित वित्तीय नुकसान उठाना पड़ सकता है। इस भारी राशि का सीधा असर बैंक के पूंजी पर्याप्तता अनुपात (Capital Adequacy Ratio) और टियर-1 कैपिटल पर पड़ना तय है। निवेशकों और बड़े म्यूचुअल फंड्स को डर है कि यदि बैंक को इतनी बड़ी राशि का प्रावधान (Provisioning) अपनी बैलेंस शीट में करना पड़ा, तो आने वाली तिमाहियों में बैंक का पूरा मुनाफा साफ हो सकता है और बैंक को फिर से अतिरिक्त पूंजी जुटाने के लिए इक्विटी का सहारा लेना पड़ेगा। जब भी किसी कंपनी को भारी पूंजी की कमी का सामना करना पड़ता है और नए शेयर जारी करने की नौबत आती है, तो मौजूदा शेयरधारकों की हिस्सेदारी डाइल्यूट होने का डर पैदा होता है। इसी संभावित वित्तीय जोखिम की वजह से संस्थागत निवेशक अपने मुनाफे की बुकिंग कर शेयर से दूरी बनाते दिख रहे हैं।
नतीजों के भीतर छिपे कमजोर पहलू: ट्रेजरी गेन पर निर्भरता और कॉरपोरेट बैंकिंग में सुस्ती
बाजार के जानकारों ने जब यस बैंक के नतीजों की बारीकी से पड़ताल की, तो उन्हें मुनाफे के पीछे का ढांचा पूरी तरह संतुलित नहीं लगा। बैंक का मुनाफा जरूर 65 फीसदी बढ़ा है, लेकिन इस बढ़त का एक बहुत बड़ा हिस्सा उसकी ट्रेजरी ऑपरेशंस (ट्रेजरी संचालन) से हासिल हुआ है, जिसका प्री-टैक्स प्रॉफिट पिछले साल के ₹380 करोड़ से उछलकर ₹715 करोड़ हो गया। इसके उलट, बैंक के मुख्य कॉरपोरेट बैंकिंग सेगमेंट में कमजोरी देखने को मिली है। कॉरपोरेट बैंकिंग से होने वाला कर-पूर्व लाभ पिछले साल की समान अवधि के ₹790 करोड़ से गिरकर ₹573 करोड़ पर आ गया। शेयर बाजार हमेशा उस कमाई को अधिक प्रीमियम देता है जो कोर लेंडिंग और मुख्य कारोबारी संचालन से लगातार उत्पन्न होती है, न कि ट्रेजरी या एकमुश्त गैर-ब्याज आय से। कॉरपोरेट बुक में आई यह सुस्ती भी निवेशकों के विश्वास को पूरी तरह जीतने में नाकाम रही।
रिटेल निवेशकों के मन में संशय और कानूनी उपायों पर बैंक का रुख
यस बैंक देश के उन चुनिंदा शेयरों में शामिल है जिसमें रिटेल निवेशकों यानी आम जनता की भारी तादाद मौजूद है। साल 2020 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और अन्य बैंकों के नेतृत्व में पुनर्गठन योजना लागू होने के बाद से ही लाखों खुदरा निवेशक इस उम्मीद में बैठे हैं कि यस बैंक कभी अपने पुराने स्वर्णिम दिनों की तरह ₹100 या ₹200 के स्तर को छुएगा। हालांकि, जब भी शेयर में रिकवरी की उम्मीद बंधती है, कोई न कोई कानूनी या संरचनात्मक अड़चन सामने आ जाती है। यस बैंक के शीर्ष प्रबंधन और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) ने स्पष्ट किया है कि बैंक सुप्रीम कोर्ट के फैसले के वित्तीय, वैधानिक और अकाउंटिंग पहलुओं का गहनता से अध्ययन कर रहा है और सभी उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। बैंक रिव्यू पिटीशन या अन्य कानूनी मंचों का रुख कर सकता है, लेकिन कानूनी लड़ाई लंबी चलने की आशंका ने बाजार की धारणा को कमजोर कर दिया है।
क्या कहते हैं ब्रोकरेज हाउस और आगे का क्या है आउटलुक?
दलाल स्ट्रीट के प्रमुख ब्रोकरेज हाउसों ने यस बैंक के नतीजों के बाद अपने रुख को सतर्क बनाए रखा है। विश्लेषकों का कहना है कि जब तक AT-1 बॉन्ड मामले पर कानूनी स्थिति पूरी तरह साफ नहीं हो जाती और संभावित ₹5,217 करोड़ के वित्तीय झटके का सटीक समाधान सामने नहीं आ जाता, तब तक शेयर में कोई बड़ी तेजी की संभावना सीमित है। तकनीकी चार्ट पर भी शेयर अपने महत्वपूर्ण सपोर्ट लेवल्स के आसपास संघर्ष कर रहा है। भले ही बैंक के डिपॉजिट में 19.5% और एडवांस में 23.7% की वार्षिक वृद्धि एक मजबूत बुनियादी सुधार की ओर इशारा करती है, लेकिन बाजार के लिए वित्तीय अनिश्चितता हमेशा से सबसे बड़ा नकारात्मक कारक रही है। निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि वे केवल ऊपरी मुनाफे के आंकड़ों को देखकर जल्दबाजी में फैसला न लें, बल्कि बैंक की अगली कानूनी रणनीति और पूंजीगत योजनाओं पर पैनी नजर बनाए रखें।