क्या स्मार्टवॉच पकड़ सकती है स्ट्रोक? डॉक्टरों ने बताया तकनीक और हकीकत का पूरा सच

क्या स्मार्टवॉच पकड़ सकती है स्ट्रोक? डॉक्टरों ने बताया तकनीक और हकीकत का पूरा सच

नई दिल्ली। कलाई पर बंधी आधुनिक स्मार्टवॉच आज सिर्फ समय देखने या कदम गिनने का साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह एक पर्सनल हेल्थ ट्रैकर बन चुकी है। हार्ट रेट मॉनिटरिंग, स्लीप ट्रैकिंग, ब्लड ऑक्सीजन (SpO2) और यहां तक कि सिंगल-लीड ईसीजी (ECG) जैसी खूबियों के साथ आने वाले इन गैजेट्स को लेकर लोगों में यह भरोसा तेजी से बढ़ रहा है कि यह शरीर में होने वाली हर बड़ी मेडिकल इमरजेंसी को पहले ही भांप सकती हैं। सोशल मीडिया और विज्ञापनों के दौर में यह सवाल अक्सर तैरता है कि क्या स्मार्टवॉच जानलेवा ब्रेन स्ट्रोक (मस्तिष्क का दौरा) को पकड़ सकती है? कार्डियोलॉजिस्ट्स और न्यूरोलॉजिस्ट्स की राय में इस दावे के पीछे कुछ तकनीकी तथ्य तो हैं, लेकिन पूरी तरह इस पर निर्भर रहना जानलेवा भ्रम भी साबित हो सकता है।

चिकित्सा विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि स्मार्टवॉच सीधे तौर पर ब्रेन स्ट्रोक को डिटेक्ट नहीं कर सकती। स्ट्रोक का संबंध मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं में रुकावट (इस्केमिक स्ट्रोक) या नसों के फटने (हेमरेजिक स्ट्रोक) से होता है, जिसे केवल हॉस्पिटल में सीटी स्कैन या एमआरआई के जरिए ही देखा जा सकता है। कलाई पर लगे सेंसर मस्तिष्क के अंदर हो रहे रक्त प्रवाह या न्यूरोलॉजिकल बदलावों को ट्रैक करने में सक्षम नहीं हैं। फिर भी, तकनीक और मेडिकल साइंस के गठजोड़ ने स्मार्टवॉच को स्ट्रोक की रोकथाम का एक अप्रत्यक्ष माध्यम जरूर बना दिया है।

एट्रियल फाइब्रिलेशन की पहचान: स्मार्टवॉच की सबसे बड़ी ताकत

स्मार्टवॉच जिस सबसे बड़े खतरे को पकड़ने में मदद करती है, वह है एट्रियल फाइब्रिलेशन (Atrial Fibrillation या AFib)। यह दिल की धड़कनों से जुड़ी एक गंभीर बीमारी (एरिदमिया) है, जिसमें दिल के ऊपरी कक्ष असामान्य और अनियमित गति से धड़कने लगते हैं। मेडिकल रिसर्च के अनुसार, दुनिया भर में होने वाले कुल इस्केमिक ब्रेन स्ट्रोक के लगभग 20 से 25 प्रतिशत मामले सीधे तौर पर अनियंत्रित एट्रियल फाइब्रिलेशन के कारण होते हैं।

जब दिल अनियमित रूप से धड़कता है, तो उसके भीतर रक्त पूरी तरह पंप नहीं हो पाता और थक्के (Blood Clots) बनने लगते हैं। ये थक्के दिल से निकलकर मस्तिष्क की नसों में जाकर फंस जाते हैं, जिससे अचानक स्ट्रोक हो जाता है। आधुनिक एफडीए-स्वीकृत स्मार्टवॉच में मौजूद फोटोप्लेथिस्मोग्राफी (PPG) सेंसर और सिंगल-लीड ईसीजी अनियमित धड़कनों को पहचानकर यूजर को तुरंत अलर्ट दे देते हैं। यदि किसी व्यक्ति को समय रहते पता चल जाए कि उसे AFib है, तो वह डॉक्टर से मिलकर ब्लड थिनर (खून पतला करने वाली दवाएं) शुरू कर सकता है, जिससे भविष्य में स्ट्रोक का खतरा काफी हद तक टल जाता है।

सीधे स्ट्रोक को क्यों नहीं पकड़ सकती कलाई पर बंधी वॉच?

चिकित्सकीय दृष्टिकोण से स्ट्रोक एक अचानक घटने वाली न्यूरोलॉजिकल घटना है। जब दिमाग के किसी हिस्से को ऑक्सीजन युक्त रक्त मिलना बंद होता है, तो वहां की कोशिकाएं मिनटों में मरने लगती हैं। स्मार्टवॉच के पास मस्तिष्क की गतिविधि, इंट्राकैनायल प्रेशर (खोपड़ी के अंदर का दबाव) या सेरेब्रल ब्लड फ्लो को मापने का कोई सेंसर नहीं होता।

इसके अलावा, हर स्ट्रोक दिल की बीमारी से नहीं होता। हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धमनियों में प्लाक जमना (एथेरोस्क्लेरोसिस), अत्यधिक कोलेस्ट्रॉल या मस्तिष्क की नस फटने (एन्यूरिज्म) से होने वाले स्ट्रोक में दिल की धड़कन अक्सर पूरी तरह सामान्य रहती है। ऐसी स्थितियों में स्मार्टवॉच का हार्ट रेट या ईसीजी बिल्कुल सामान्य डेटा दिखाएगा, जबकि मरीज के मस्तिष्क में स्ट्रोक की प्रक्रिया शुरू हो चुकी होगी। इसलिए, यदि कोई यह सोचकर निश्चिंत बैठ जाए कि उसकी घड़ी कोई अलर्ट नहीं दे रही है तो सब ठीक है, तो यह बेहद खतरनाक हो सकता है।

फॉल्स पॉजिटिव और पैनिक का बढ़ता जोखिम

डॉक्टर इस बात को लेकर भी आगाह करते हैं कि स्मार्टवॉच 100 प्रतिशत सटीक मेडिकल उपकरण नहीं हैं। कई बार कलाई पर पसीना आने, घड़ी ढीली होने, तेज चलने या साधारण चिंता (एंग्जायटी) के कारण वॉच का एल्गोरिदम धड़कन को गलत तरीके से अनियमित पढ़ लेता है। इसे मेडिकल भाषा में 'फॉल्स पॉजिटिव' कहा जाता है।

अस्पतालों की ओपीडी में ऐसे कई मरीज पहुंचते हैं जो स्मार्टवॉच के गलत नोटिफिकेशन को देखकर गंभीर तनाव या पैनिक अटैक का शिकार हो जाते हैं। दूसरी तरफ, 'फॉल्स नेगेटिव' की स्थिति और भी बदतर होती है, जहां बीमारी होने के बावजूद सेंसर उसे पकड़ नहीं पाता और मरीज झूठी सुरक्षा की भावना में रहकर अस्पताल जाने में देरी कर देता है। डॉक्टरों के अनुसार, स्मार्टवॉच एक वेक-अप कॉल या स्क्रीनिंग टूल हो सकती है, लेकिन यह हॉस्पिटल के 12-लीड ईसीजी या मेडिकल ग्रेड हॉल्टर मॉनिटर का विकल्प कभी नहीं बन सकती।

तकनीक नहीं, स्ट्रोक के समय काम आता है 'FAST' नियम

ब्रेन स्ट्रोक के मामले में हर सेकंड कीमती होता है, जिसे मेडिकल जगत में 'गोल्डन ऑवर' कहा जाता है। स्मार्टवॉच के डेटा पर नजर गड़ाने के बजाय डॉक्टरों की सलाह है कि हर व्यक्ति को स्ट्रोक के क्लासिक लक्षणों को पहचानना आना चाहिए, जिसे वैश्विक स्तर पर 'FAST' फॉर्मूले से याद रखा जाता है:

  • F (Face Drooping): चेहरे का एक तरफ झुक जाना या मुस्कुराते समय मुंह का टेढ़ा हो जाना।

  • A (Arm Weakness): एक हाथ में कमजोरी, सुन्नता या दोनों हाथ उठाने पर एक हाथ का नीचे गिरना।

  • S (Speech Difficulty): बोलने में लड़खड़ाहट, आवाज का अस्पष्ट होना या दूसरों की बात समझने में असमर्थता।

  • T (Time to Call Emergency): इनमें से कोई भी एक लक्षण दिखने पर बिना समय गंवाए तुरंत मरीज को निकटतम स्ट्रोक-रेडी अस्पताल ले जाएं।

स्मार्टवॉच स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने और दिल की असामान्य हरकतों पर नजर रखने के लिए एक बेहतरीन तकनीकी साथी है। यह आपको डॉक्टर के पास जाने की पूर्व चेतावनी दे सकती है, लेकिन वास्तविक स्ट्रोक के लक्षण दिखने पर गैजेट के नोटिफिकेशन का इंतजार करने के बजाय तत्काल चिकित्सकीय मदद लेना ही जीवन रक्षा का एकमात्र रास्ता है।