MLC के पास कितनी होती है पावर और कितनी मिलती है सैलरी? महीने के 2.66 लाख, 5 करोड़ की निधि और VIP सुविधाओं का पूरा लेखा-जोखा
देश के जिन राज्यों में दोहरी विधायिका यानी द्विसदनीय व्यवस्था (विधानसभा और विधान परिषद) लागू है, वहां विधान परिषद सदस्य यानी एमएलसी (Member of Legislative Council) का पद बेहद प्रतिष्ठा और रसूख वाला माना जाता है। विधानसभा को निचला सदन और जनता का सीधा सदन कहा जाता है, जबकि विधान परिषद को वरिष्ठों, प्रबुद्धों और जानकारों का 'उच्च सदन' माना जाता है, ठीक उसी तरह जैसे केंद्र में राज्यसभा होती है। चुनावी मौसम में अक्सर जनता के मन में यह सवाल उठता है कि सीधे जनता द्वारा चुने जाने वाले विधायकों (MLA) की तुलना में अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाने वाले एमएलसी के पास क्या संवैधानिक अधिकार होते हैं, उन्हें हर महीने कितनी तनख्वाह मिलती है और सरकार की तरफ से उन्हें कौन-कौन सी वीआईपी सुविधाएं और सुरक्षा मुहैया कराई जाती है।
एमएलसी के पास क्या होती हैं शक्तियां और अधिकार? कानून बनाने में कितनी है भूमिका?
एमएलसी राज्य विधानमंडल के उच्च सदन का अभिन्न अंग होते हैं। उनके पास राज्य के विधायी और नीतिगत फैसलों को प्रभावित करने के कई अहम अधिकार होते हैं:
-
कानून निर्माण में सीधी भागीदारी: राज्य सूची और समवर्ती सूची से जुड़े सामान्य विधेयक (Ordinary Bills) विधान परिषद में भी पेश किए जा सकते हैं। किसी भी सामान्य कानून को अंतिम रूप देने से पहले विधान परिषद में उस पर विस्तृत बहस होती है, संशोधन के सुझाव दिए जाते हैं और परिषद किसी विधेयक को अधिकतम 4 महीने (पहली बार में 3 महीने और पुनर्विचार के बाद 1 महीना) तक रोक सकती है।
-
सरकार से तीखे सवाल पूछने का अधिकार: एमएलसी को सदन में मंत्रियों और सरकार से किसी भी योजना, बजट आवंटन, प्रशासनिक विफलता और नीति पर तारांकित व अतारांकित सवाल पूछने का पूरा अधिकार होता है। इसके जरिए वे सरकार की जवाबदेही तय करते हैं।
-
जनता और विशिष्ट वर्गों की समस्याएं उठाना: चूंकि एमएलसी अलग-अलग वर्गों—जैसे पंजीकृत स्नातक, माध्यमिक व उच्च प्राथमिक शिक्षक, स्थानीय निकायों (नगर निगम, जिला पंचायत) के प्रतिनिधि—से चुनकर आते हैं, इसलिए वे अपने-अपने समूहों और जनहित से जुड़े मुद्दों को सीधे सदन के पटल पर पुरजोर तरीके से रखते हैं।
-
मुख्यमंत्री और मंत्री बनने का अधिकार: संविधान के तहत एमएलसी बनने वाला कोई भी व्यक्ति राज्य का मुख्यमंत्री या कैबिनेट मंत्री बन सकता है। उत्तर प्रदेश में खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पहले कार्यकाल में विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) बनकर ही सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। इसी तरह महाराष्ट्र, बिहार में भी कई दिग्गज नेता एमएलसी बनकर मंत्री पद संभालते रहे हैं।
-
वित्तीय मामलों में सीमाएं (Money Bill): एमएलसी की शक्तियां विधानसभा के समान असीमित नहीं होतीं। धन विधेयक (Money Bill) केवल विधानसभा में पेश किया जा सकता है। विधान परिषद धन विधेयक को खारिज नहीं कर सकती, वह केवल 14 दिनों के भीतर अपने सुझाव दे सकती है। यदि 14 दिनों में बिल वापस न भेजा जाए, तो उसे दोनों सदनों से स्वतः पारित मान लिया जाता है। इसके अलावा, विधान परिषद सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती।
कितनी मिलती है सैलरी और भत्ते? यूपी का पूरा गणित
एमएलसी का वेतन और भत्ते हर राज्य के अपने विधायी अधिनियम के अनुसार तय होते हैं। उत्तर प्रदेश में राज्य विधानमंडल सदस्य एवं मंत्री सुख-सुविधा विधि (संशोधन) के तहत वेतन और भत्तों में संशोधन किया गया है।
उत्तर प्रदेश में एक एमएलसी को वेतन, भत्ते और अन्य मदों को मिलाकर हर महीने लगभग 2.66 लाख रुपये की कुल राशि मिलती है:
-
मूल वेतन (Basic Salary): 35,000 रुपये प्रति माह।
-
निर्वाचन क्षेत्र भत्ता (Constituency Allowance): 75,000 रुपये प्रति माह।
-
चिकित्सा भत्ता: 45,000 रुपये प्रति माह (ओपीडी व अन्य चिकित्सीय खर्चों के लिए)।
-
सचिवीय एवं कार्यालय भत्ता: 30,000 रुपये प्रति माह।
-
टेलीफोन और संचार भत्ता: 9,000 रुपये प्रति माह।
-
दैनिक बैठक भत्ता: सदन के सत्र या विधायी समितियों की बैठक में भाग लेने पर 2,500 रुपये प्रति दिन का अतिरिक्त भत्ता मिलता है। जनसेवा कार्यों और दौरों के लिए भी 2,000 रुपये प्रतिदिन का प्रावधान है।
बिहार में एमएलसी का कुल मासिक वेतन-भत्ता लगभग 1.6 लाख से 1.8 लाख रुपये, महाराष्ट्र में लगभग 2.5 लाख से 2.8 लाख रुपये और कर्नाटक में 2 लाख रुपये के करीब होता है।
सुविधाएं भी कम नहीं: आवास, मुफ्त बिजली और 5 लाख के कूपन
सैलरी और भत्तों के अलावा सरकार की ओर से विधान परिषद सदस्यों को कई वीआईपी सुविधाएं दी जाती हैं:
-
राजधानी में सरकारी आवास: कार्यकाल के दौरान राज्य की राजधानी (जैसे लखनऊ) में विधायक निवास या फ्लैट की सुविधा बहुत ही मामूली किराए पर मिलती है। आवास न लेने पर निर्धारित आवास भत्ता दिया जाता है।
-
सालाना 5 लाख रुपये के यात्रा कूपन: एमएलसी को आधिकारिक और निजी दौरों के लिए प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक के रेलवे फर्स्ट एसी या घरेलू हवाई यात्रा के कूपन दिए जाते हैं, जिनका उपयोग वे और उनके सहयात्री कर सकते हैं।
-
मुफ्त बिजली और टोल छूट: विधान परिषद सदस्यों को आवास पर 2000 यूनिट तक मुफ्त बिजली और नेशनल व स्टेट हाईवे पर लगे टोल प्लाजा पर वीआईपी लेन से मुफ्त आवागमन (टोल फ्री) की सुविधा मिलती है।
-
कैशलेस मेडिकल ट्रीटमेंट: एमएलसी और उनके आश्रित परिवार को सरकारी और सूचीबद्ध बड़े निजी अस्पतालों में गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए असीमित कैशलेस चिकित्सा सुविधा और बिलों की प्रतिपूर्ति मिलती है।
-
सरकारी गनर और सुरक्षा: प्रोटोकॉल और खतरे के आकलन के आधार पर एमएलसी को गृह विभाग द्वारा व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी (गनर) और स्थानीय दौरों पर पायलट/एस्कॉर्ट सुरक्षा उपलब्ध कराई जाती है।
क्षेत्र के विकास के लिए हर साल 5 करोड़ रुपये की विधायक निधि
एमएलसी को अपने निर्वाचन क्षेत्र और समाज के विकास कार्यों की सिफारिश करने के लिए भारी-भरकम विकास निधि दी जाती है। उत्तर प्रदेश में प्रत्येक एमएलसी को प्रति वर्ष 5 करोड़ रुपये की 'विधानमंडल क्षेत्र विकास निधि' (MLALAD Fund) आवंटित होती है। इस निधि से एमएलसी अपने क्षेत्र में सड़कें, स्ट्रीट लाइट, सोलर पैनल, सरकारी स्कूलों में कमरे, सामुदायिक भवन, पेयजल के लिए सबमर्सिबल और अस्पताल के उपकरण लगवाने की लिखित सिफारिश जिला प्रशासन को भेज सकते हैं। 6 साल के कार्यकाल में एक एमएलसी कुल 30 करोड़ रुपये के विकास कार्यों की अनुशंसा कर सकता है।
जीवनभर की सुरक्षा: पेंशन और पारिवारिक पेंशन के नियम
एमएलसी का पद छोड़ने के बाद भी आर्थिक सुरक्षा का पूरा ख्याल रखा जाता है। उत्तर प्रदेश में पूर्व एमएलसी को आजीवन पेंशन दी जाती है:
-
मूल पेंशन: 35,000 रुपये प्रति माह निर्धारित है।
-
कार्यकाल वृद्धि: पहला 6 साल का पूर्ण कार्यकाल पूरा करने पर 2,000 रुपये अतिरिक्त जोड़कर न्यूनतम 37,000 रुपये प्रति माह पेंशन मिलती है। इसके बाद एक कार्यकाल से अधिक सेवा के प्रत्येक पूर्ण वर्ष के लिए 2,000 रुपये प्रति माह अतिरिक्त पेंशन जुड़ती जाती है।
-
पारिवारिक पेंशन: सदस्य के निधन के बाद उनके पति या पत्नी (अथवा पात्र आश्रितों) को लागू पेंशन का 50% या न्यूनतम 30,000 रुपये प्रति माह परिवार पेंशन के रूप में दी जाती है। साथ ही पूर्व सदस्यों को भी आजीवन मुफ्त रेलवे यात्रा और सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज की सुविधा मिलती है।
6 साल का स्थायी कार्यकाल: कभी भंग नहीं होती विधान परिषद
एमएलसी का चुनाव और कार्यकाल भी सामान्य विधायकों से अलग होता है। विधानसभा का कार्यकाल 5 साल का होता है और उसे बीच में भी भंग किया जा सकता है। लेकिन विधान परिषद एक 'स्थायी सदन' है, जिसे कभी भंग नहीं किया जा सकता। प्रत्येक एमएलसी का कार्यकाल 6 साल का होता है। सदन में निरंतरता बनी रहे, इसलिए हर दो साल में लगभग एक-तिहाई (1/3) सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं और उनकी जगह नए सदस्यों का चुनाव कराया जाता है। एमएलसी बनने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी अनिवार्य है, जबकि विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष होती है। यही वजह है कि एमएलसी का पद वित्तीय और प्रशासनिक रूप से बेहद मजबूत और आकर्षक माना जाता है।