ज्ञानेश कुमार को कैसे बना दिया CEC? सुप्रीम कोर्ट पहुंचा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का विवाद

ज्ञानेश कुमार को कैसे बना दिया CEC? सुप्रीम कोर्ट पहुंचा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का विवाद

भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था 'भारत निर्वाचन आयोग' (ECI) के शीर्ष नेतृत्व की नियुक्ति प्रक्रिया एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंच गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी की नियुक्तियों की वैधता को सीधे तौर पर चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक नई रिट याचिका दायर की गई है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि केंद्र सरकार और चयन समिति ने इन वरिष्ठ नौकरशाहों को चुनाव आयोग के शीर्ष पदों पर बैठाते समय 2023 के नए नियुक्ति कानून के अनिवार्य नियमों का पालन आखिर क्यों नहीं किया? याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत 'अधिकार-पृच्छा' (Writ of Quo Warranto) जारी करने की मांग की है, जिसके तहत किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति से यह पूछा जाता है कि वह किस प्राधिकार या कानूनी हैसियत से उस पद पर आसीन है। चुनाव आयोग के भीतर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और वोटर लिस्ट से जुड़े हालिया विवादों के बीच इस याचिका ने दिल्ली के सियासी और कानूनी गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।

क्या है पूरा मामला और सुप्रीम कोर्ट में किन बिंदुओं पर उठाए गए हैं सवाल?

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में मुख्य रूप से 14 मार्च 2024 और 17 फरवरी 2025 को जारी उन आधिकारिक अधिसूचनाओं को रद्द करने की मांग की गई है, जिनके जरिए ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को पहले चुनाव आयुक्त बनाया गया, फिर बाद में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त पद पर पदोन्नत किया गया और विवेक जोशी को तीसरे आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ये सभी नियुक्तियां संसद द्वारा पारित 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 5, धारा 6 और धारा 8(1) के प्रावधानों का खुला उल्लंघन करके की गई हैं।

याचिका में दावा किया गया है कि कानून की धारा 6 के तहत यह स्पष्ट नियम है कि कानून मंत्री की अध्यक्षता वाली सर्च कमेटी (खोज समिति) को हर एक खाली पद के लिए कम से कम 5 योग्य व्यक्तियों का एक पैनल तैयार करना होता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि जब मार्च 2024 में चुनाव आयुक्तों के दो पद खाली हुए थे, तो सर्च कमेटी को चयन समिति (प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता) के सामने कम से कम 10 नामों का विधिवत पैनल रखना चाहिए था। लेकिन उस वक्त खोज समिति ने 10 के बजाय केवल 6 नाम ही आगे बढ़ाए। याचिका में कहा गया है कि दो पदों के लिए केवल 6 नामों की सूची भेजना कानून के अनिवार्य प्रावधान का उल्लंघन है, लिहाजा इसे कानून की नजर में वैध 'पैनल' नहीं माना जा सकता।

200 अधिकारियों की सूची और एक ही दिन में चयन: सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश का हवाला

याचिका में मार्च 2024 में हुई उस जल्दबाजी भरी प्रक्रिया का भी पूरा ब्योरा दिया गया है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी सवाल खड़े किए थे। याचिका के मुताबिक, 13 मार्च 2024 को विधायी विभाग के सचिव ने विपक्ष के नेता को 200 से अधिक नौकरशाहों की एक कच्ची सूची भेजी थी, जबकि उस वक्त तक सर्च कमेटी ने अपनी औपचारिक बैठक करके कोई अंतिम शॉर्टलिस्ट तैयार ही नहीं की थी। ठीक अगले दिन यानी 14 मार्च को दोपहर में सर्च कमेटी ने 6 नामों का प्रस्ताव दिया और उसी दिन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने बिना किसी विस्तृत बैकग्राउंड वेरिफिकेशन या विचार-विमर्श के ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू के नामों पर मुहर लगा दी।

याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत के 22 मार्च 2024 के पुराने आदेश का हवाला देते हुए कहा कि अदालत ने खुद उस वक्त यह टिप्पणी की थी कि चयन समिति के सदस्यों को उम्मीदवारों के संपूर्ण प्रोफाइल और विवरण का अध्ययन करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए था। कुछ ही घंटों के भीतर 200 से अधिक नामों में से दो व्यक्तियों को चुन लेना कानून की धारा 8(1) का उल्लंघन है, जो यह निर्देश देती है कि चयन समिति को अपनी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से निर्धारित करनी होगी।

क्या ज्ञानेश कुमार और संधू के पास था चुनाव कराने का अनुभव? 'योग्यता' पर विवाद

इस याचिका का सबसे चौंकाने वाला पहलू अधिकारियों की योग्यता यानी एलिजिबिलिटी पर उठाया गया सवाल है। 2023 के अधिनियम की धारा 5 के अनुसार, चुनाव आयुक्त पद पर केवल वही व्यक्ति नियुक्त किया जा सकता है जो भारत सरकार के सचिव स्तर के पद पर रहा हो, निष्कलंक सत्यनिष्ठा वाला हो और जिसके पास 'चुनावों के प्रबंधन और संचालन का ज्ञान व अनुभव' (Knowledge and Experience in Management and Conduct of Elections) हो।

याचिका में दोनों शीर्ष अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड और आधिकारिक कार्यकारी प्रोफाइल का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि नियुक्ति से पहले उनके पूरे करियर में चुनाव प्रबंधन या संचालन से जुड़ा कोई विशिष्ट अनुभव दर्ज ही नहीं है। उदाहरण के लिए, ज्ञानेश कुमार के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज 26 तबादलों और पदों में से कोई भी पद सीधे तौर पर चुनाव प्रक्रिया से संबंधित नहीं रहा है। वे गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव (जहां उन्होंने धारा 370 निरस्त करने और राम जन्मभूमि ट्रस्ट गठन के दौरान काम किया) और सहकारिता मंत्रालय के सचिव जैसे विशुद्ध प्रशासनिक पदों पर रहे हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि जब अधिकारियों के पास इस संवैधानिक दायित्व को निभाने का पूर्व अनिवार्य अनुभव ही नहीं था, तो उन्हें इन शीर्ष पदों पर कैसे बैठा दिया गया?

चुनाव आयोग के भीतर विवाद और सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

यह कानूनी चुनौती ऐसे समय में आई है जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यशैली को लेकर चुनाव आयोग के भीतर और बाहर पहले से ही तीखा विवाद चल रहा है। विपक्ष और विभिन्न नागरिक समूहों ने आरोप लगाया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), फॉर्म 6 में बदलाव और मतदाता सूचियों के केंद्रीकरण जैसे संवेदनशील नीतिगत फैसले अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों (सुखबीर संधू और विवेक जोशी) की असहमति या उन्हें दरकिनार करके एकतरफा तरीके से लिए। इस मुद्दे पर दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे जाने की खबरें भी सामने आई थीं।

हालांकि, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक संयुक्त हलफनामा दाखिल कर इन तमाम आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि एसआईआर से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने यह भी तर्क दिया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया संविधान में केवल सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह महाभियोग के जरिए ही तय है, इसलिए किसी याचिका के जरिए उनके कामकाज पर रोक नहीं लगाई जा सकती। लेकिन 27 अक्टूबर को इस मामले पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ टिप्पणी की कि 'अदालत हर पहलू से पूरी तरह अवगत है और वह इसकी गहराई से जांच करेगी'।

सुप्रीम कोर्ट में अब दिवाली की छुट्टियों के बाद इस बहुचर्चित मामले पर विस्तृत सुनवाई होनी है। 2023 के उस कानून की संवैधानिकता, जिसमें मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन समिति से बाहर कर दिया गया था, पहले से ही शीर्ष अदालत के विचाराधीन है। अब ज्ञानेश कुमार, सुखबीर संधू और विवेक जोशी की व्यक्तिगत नियुक्तियों पर उठे इन सवालों ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग दोनों को कानूनी कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह देखना बेहद अहम होगा कि देश की सर्वोच्च अदालत निर्वाचन आयोग की शुचिता और उसकी शीर्ष नियुक्तियों की कानूनी प्रक्रिया को लेकर क्या अंतिम फैसला सुनाती है।