मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग पर संसद में संग्राम
देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी शुचिता की सबसे बड़ी प्रहरी मानी जाने वाली संस्था भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के शीर्ष नेतृत्व को लेकर राष्ट्रीय राजनीति में अभूतपूर्व घमासान छिड़ गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों ने मोर्चा खोलते हुए उनके इस्तीफे और पद से हटाने की मांग को लेकर संसद से लेकर सड़क तक तीखे तेवर अख्तियार कर लिए हैं। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR - स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) में कथित बड़े पैमाने पर हुई अनियमितताओं को केंद्र में रखकर विपक्ष अब मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ एक और महाभियोग (रिमूवल मोशन) लाने की रणनीति पर काम कर रहा है। इस गरमाए सियासी माहौल के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने पूरी स्थिति पर संसद का वैधानिक रुख स्पष्ट करते हुए दो-टूक कहा है कि यदि विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सदन में कोई नया महाभियोग प्रस्ताव पेश करते हैं, तो उसकी पात्रता और स्वीकार्यता को केवल और केवल संसदीय नियमों, संवैधानिक परंपराओं और स्थापित प्रक्रियाओं की कसौटी पर ही परखा जाएगा।
मतदाता सूची पुनरीक्षण में गड़बड़ी के आरोप: दो हफ्तों से ज्ञानेश कुमार के खिलाफ तेज हुआ विरोध
विपक्षी दलों का आरोप है कि देश के कई महत्वपूर्ण राज्यों में चल रहे मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान में भारी प्रशासनिक पक्षपात, फर्जी नाम जोड़ने और वैध मतदाताओं के नाम मनमाने ढंग से काटने की प्रक्रिया अपनाई गई है। विपक्षी सांसदों का दावा है कि इस पूरे अभियान की निगरानी और प्रबंधन में पारदर्शिता की घोर कमी रही है, जिसके लिए सीधे तौर पर आयोग के शीर्ष पद पर आसीन ज्ञानेश कुमार जिम्मेदार हैं। पिछले पंद्रह दिनों से राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में संसद भवन परिसर से लेकर निर्वाचन सदन के बाहर विपक्षी सांसदों और नागरिक संगठनों द्वारा लगातार धरना-प्रदर्शन किया जा रहा है। विपक्षी गठबंधन के नेताओं का कहना है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संदेह से परे होना चाहिए, इसलिए जब तक इस पूरे प्रकरण की संयुक्त संसदीय समिति (JPC) या सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से जांच नहीं कराई जाती, तब तक ज्ञानेश कुमार को अपने पद से तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए।
आयोग के भीतर से ही उठे बगावत के सुर: दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार दर्ज कराई थी लिखित आपत्ति
विपक्ष का यह आंदोलन उस समय और अधिक आक्रामक तथा विस्फोटक हो गया, जब हाल ही में सामने आई एक खोजी प्रशासनिक रिपोर्ट में निर्वाचन आयोग के आंतरिक कामकाज की हैरान करने वाली जानकारी सार्वजनिक हुई। रिपोर्ट के अनुसार, आयोग के अन्य दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों के दौरान विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े नीतिगत फैसलों, सर्कुलरों और प्रशासनिक आदेशों पर कम से कम 14 बार अपनी गंभीर लिखित असहमतियां और आपत्तियां दर्ज कराई थीं। दोनों चुनाव आयुक्तों का मुख्य आक्षेप यह था कि एसआईआर से संबंधित कई संवेदनशील और दूरगामी प्रभाव वाले दिशा-निर्देश उनकी पूर्व सहमति, औपचारिक संज्ञान या सिफारिशों के बिना ही सीधे जारी कर दिए गए थे। चुनाव आयोग जैसे त्रि-सदस्यीय संवैधानिक निकाय के भीतर लिए जाने वाले निर्णयों में सर्वसम्मति या औपचारिक बहुमत की अनदेखी के इन आरोपों ने आयोग की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है और इसे विपक्ष ने अपना सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बना लिया है।
पहले भी दो बार हो चुकी है हटाने की कोशिश: लोकसभा स्पीकर ने स्पष्ट किए संसदीय महाभियोग के नियम
यह पहली बार नहीं है जब ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से हटाने के लिए विपक्ष ने विधायी कदम उठाए हों। इससे पहले भी विपक्षी सांसदों द्वारा दो अलग-अलग मौकों पर उन्हें पद से हटाने के लिए नोटिस दिए जा चुके हैं। पहले प्रयास के दौरान लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने तकनीकी खामियों और आवश्यक संख्या बल के अभाव का हवाला देते हुए नोटिस को प्राथमिक स्तर पर ही खारिज कर दिया था। वहीं, दूसरे प्रयास के तहत दिए गए नोटिस पर उच्च सदन यानी राज्यसभा में अभी भी वैधानिक प्रक्रिया लंबित बताई जा रही है। गुरुवार देर शाम जब संसद भवन के पत्रकारों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से तीसरे संभावित महाभियोग प्रस्ताव को लेकर सवाल किया, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि संसद किसी राजनीतिक दबाव में नहीं बल्कि संविधान और प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियमों (Rules of Procedure and Conduct of Business) के तहत संचालित होती है। उन्होंने कहा कि जब भी कोई औपचारिक प्रस्ताव सचिवालय को प्राप्त होगा, तो नियमों के तहत आवश्यक हस्ताक्षरों, आधारों और विधायी शर्तों की निष्पक्ष जांच की जाएगी और उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा।
संवैधानिक सुरक्षा कवच: सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही हटाया जा सकता है मुख्य चुनाव आयुक्त
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को कार्यपालिका के किसी भी मनमाने हस्तक्षेप से बचाने के लिए एक अत्यंत मजबूत संवैधानिक सुरक्षा कवच प्रदान किया गया है। संविधान के प्रावधानों के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस रीति और आधारों पर उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के किसी न्यायाधीश को पदमुक्त किया जाता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में 'साबित कदाचार' (Proved Misbehaviour) या 'असमर्थता' (Incapacity) के आधार पर विशेष महाभियोग जैसी प्रक्रिया पूरी करनी होती है। इसके तहत लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षरित प्रस्ताव की आवश्यकता होती है। प्रस्ताव स्वीकार होने पर आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय न्यायिक समिति गठित की जाती है। यदि समिति आरोपों को सही पाती है, तो संसद के दोनों सदनों द्वारा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत तथा कुल सदस्य संख्या के साधारण बहुमत से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य होता है। इस अत्यंत जटिल और उच्च विधायी प्रक्रिया के कारण भारत के इतिहास में अब तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग के जरिए पद से नहीं हटाया जा सका है, लेकिन मौजूदा विवाद ने संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर एक नई राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है।