'कोमा में गए मरीज की मौत पर आश्रितों का लाचार होना चिंताजनक'
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत संवेदनशील और गंभीर मानवीय मुद्दे पर केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को आड़े हाथों लिया है। कोमा जैसी अचेत अवस्था में लंबे समय तक जिंदगी और मौत से जूझ रहे मरीज और उसके बाद उसकी दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु की स्थिति में उसके निजी बैंक खाते में जमा धन आश्रितों को न मिलने की विसंगति पर अदालत ने गहरी चिंता व्यक्त की है। न्यायालय ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि जब परिवार का मुखिया या कमाने वाला सदस्य कोमा में चला जाता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसके आश्रित परिजन पूरी तरह असहाय और लाचार हो जाते हैं। उनके पास न तो अस्पताल का भारी-भरकम बिल भरने के लिए नकदी होती है और न ही रोजमर्रा का घरेलू खर्च चलाने का कोई साधन बचता है। ऐसे विषम संकट में व्यक्ति की अपनी ही गाढ़ी कमाई बैंक खातों में बंद पड़ी रह जाती है और कठोर बैंकिंग नियमों के चलते पत्नी या बच्चे उसे छू तक नहीं पाते। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस कानूनी शून्य को भरने के लिए सक्षम विधायिका से कानून बनाने अथवा रिजर्व बैंक को सभी राष्ट्रीयकृत और निजी बैंकों के लिए एक स्पष्ट व ठोस नियामक गाइडलाइन जारी करने का कड़ा निर्देश दिया है।
कानपुर की परवीन जहां का दर्दनाक मामला: पति के कोमा में जाने और निधन के बाद बैंक ने रोकी पाई-पाई
यह महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की संयुक्त खंडपीठ ने कानपुर नगर की रहने वाली परवीन जहां की रिट याचिका पर विस्तृत सुनवाई करते हुए दी है। मामले के तथ्यों के अनुसार, परवीन जहां के पति शमशाद अली गंभीर बीमारी के चलते कोमा में चले गए थे। पति के भारतीय स्टेट बैंक (SBI) स्थित बचत खाते में पर्याप्त धनराशि जमा थी, लेकिन बैंक के परिचालन नियमों के अनुसार खाताधारक के व्यक्तिगत हस्ताक्षर, अंगूठे के निशान या बायोमेट्रिक सत्यापन के बिना उस खाते से एक रुपया भी नहीं निकाला जा सकता था। अस्पताल में चल रहे महंगे इलाज, दवाओं के खर्च और बच्चों के भरण-पोषण के लिए दर-दर की ठोकरें खाने के बाद परवीन जहां ने विवश होकर इसी वर्ष जुलाई में इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने 'नेशनल ट्रस्ट फॉर वेलफेयर ऑफ पर्सन्स विद ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मेंटल रिटार्डेशन एंड मल्टीपल डिसेबिलिटीज एक्ट, 1999' के तहत स्वयं को अपने अचेत पति का कानूनी अभिभावक (लीगल गार्जियन) घोषित किए जाने की गुहार लगाई थी, ताकि वे बैंक से आवश्यक धन निकालकर पति का इलाज जारी रख सकें।
कोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आई दुखद खबर: इलाज के अभाव में खाताधारक ने तोड़ा दम
मामले की सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता ने खंडपीठ को बेहद दुखद सूचना देते हुए अवगत कराया कि याचिका लंबित रहने के दौरान ही उचित वित्तीय संसाधनों और इलाज के संघर्ष के बीच कोमा में पड़े खाताधारक शमशाद अली का निधन हो गया। इसके बाद भी बैंक के जटिल उत्तराधिकार नियमों और तकनीकी प्रक्रियाओं के कारण उनकी बेसहारा विधवा को खाते से राहत राशि नहीं मिल पा रही थी। इस पर पीठ ने गहरी संवेदना और तल्खी जताते हुए याची को तात्कालिक राहत के तौर पर मृतक पति के एसबीआई खाते में जमा धनराशि को सामान्य उत्तराधिकार (सक्सेशन) प्रक्रियाओं के तहत जारी कराने की औपचारिक छूट प्रदान कर दी है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि यह कोई अकेला मामला नहीं है, बल्कि देश भर में रोजाना हजारों परिवार इस तरह के कानूनी अवरोधों के चलते अपने ही पैसों के मोहताज होकर भुखमरी और कंगाली के कगार पर पहुंच जाते हैं।
खंडपीठ का कड़ा सवाल: क्या आपात स्थिति के लिए बैंकों के पास कोई मानवीय प्रस्ताव या मानक प्रक्रिया है?
न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने अपनी विस्तृत टिप्पणी में कहा कि यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति है कि देश की मौजूदा वित्तीय और विधिक व्यवस्था में कोमा के मरीजों के आश्रितों के अधिकारों के संरक्षण के लिए कोई त्वरित आपातकालीन तंत्र मौजूद नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जब व्यक्ति कोमा में होता है, तब वह जीवित तो रहता है किंतु निर्णय लेने या बैंक जाने में पूर्णतः अक्षम होता है; ऐसी स्थिति में न तो पावर ऑफ अटॉर्नी काम आती है और न ही मृत्यु पूर्व का कोई सामान्य पत्र। इसलिए सक्षम विधायिका की ओर से एक स्पष्ट कानून अथवा भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से सभी वाणिज्यिक व राष्ट्रीयकृत बैंकों के लिए एक बाध्यकारी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) अत्यंत आवश्यक है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना राज्य का संवैधानिक दायित्व है कि ऐसे मरीजों के बैंक खातों से आपातकालीन मेडिकल खर्चों और परिवार के जीवन-यापन के लिए धन तुरंत और पारदर्शी तरीके से रिलीज किया जा सके।
केंद्र सरकार और आरबीआई को नोटिस: वित्त मंत्रालय के सचिव और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर को बनाया पक्षकार
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले को केवल एक व्यक्तिगत विवाद तक सीमित न रखते हुए इसे नीतिगत स्तर पर सुलझाने की बड़ी पहल की है। कोर्ट ने मामले का दायरा विस्तृत करते हुए केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक को औपचारिक निर्देश जारी किया है कि वे अपना रुख साफ करें। खंडपीठ ने दोनों शीर्ष नियामक संस्थाओं को पृथक-पृथक विस्तृत शपथपत्र (काउंटर एफिडेविट) दाखिल कर यह स्पष्ट करने का आदेश दिया है कि क्या वर्तमान में उनके पास ऐसी विशेष, असामान्य और आपात परिस्थितियों से निपटने के लिए कोई नियामक ढांचा, नीतिगत प्रस्ताव या दिशा-निर्देश मौजूद हैं? कोर्ट ने याची को यह भी निर्देश दिया कि वे आरबीआई के कार्यकारी निदेशक (बैंकिंग रेगुलेशन) और केंद्रीय वित्त मंत्रालय के सचिव को इस याचिका में तत्काल प्रतिवादी पक्षकार (रेस्पोंडेंट) के रूप में शामिल करें। अदालत ने इस जनहितकारी कानूनी विषय पर अगली अंतिम सुनवाई की तिथि आगामी 6 नवंबर 2026 निर्धारित की है, जिस दिन सरकार और बैंकिंग रेगुलेटर को अपना जवाब दाखिल करना होगा।