सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का बड़ा कबूलनामा; कैंसर दवाओं पर 700% तक मार्जिन का खुलासा

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का बड़ा कबूलनामा; कैंसर दवाओं पर 700% तक मार्जिन का खुलासा

देशभर के निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में इलाज के नाम पर मरीजों और उनके तीमारदारों की जेब काटने की मनमानी पर अब केंद्र सरकार सख्त रुख अपनाने जा रही है। चिकित्सा के नाम पर दवाओं, सर्जिकल उपकरणों और मेडिकल कंज्यूमेबल्स पर अत्यधिक अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) वसूलने की व्यवस्था को केंद्र सरकार ने सर्वोच्च अदालत में औपचारिक रूप से 'कुप्रथा' स्वीकार किया है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक विस्तृत हलफनामे में रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि सरकार अस्पतालों की इस मुनाफाखोरी से पूरी तरह अवगत है और मरीजों को वित्तीय शोषण से बचाने के लिए कानूनी व नीतिगत स्तर पर कड़े कदम उठा रही है। अस्पताल के कमरे में भर्ती मरीज और उसके असहाय परिजनों की स्थिति ऐसी नहीं होती कि वे दवाओं या मेडिकल बिल पर मोलभाव कर सकें, जिसका अनुचित लाभ उठाकर कई अस्पताल अत्यधिक ट्रेड मार्जिन वाली दवाएं थोपते हैं। केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत को भरोसा दिलाया है कि सभी हितधारकों से विचार-विमर्श के बाद इस पर जल्द ही प्रभावी नियंत्रण लागू किया जाएगा।

मरीजों की कमजोर सौदेबाजी का फायदा उठाते हैं अस्पताल: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का शपथपत्र

रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में स्वास्थ्य क्षेत्र की कड़वी सच्चाई को विस्तार से रेखांकित किया गया है। सरकार ने अदालत को बताया कि भारतीय दवा बाजार दुनिया के सबसे प्रतिस्पर्धी बाजारों में से एक है, जहां दवाओं का निर्माण बेहद कम लागत में होता है और दुनिया भर को सबसे किफायती दवाएं भारत ही मुहैया कराता है। सामान्य अर्थशास्त्र के नियमों के तहत जहां स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती है, वहां मूल्य नियंत्रण की आवश्यकता नहीं पड़ती। लेकिन स्वास्थ्य सेवा का ढांचा सामान्य बाजार जैसा नहीं है; यहां डॉक्टरों, फार्मेसियों और बड़े अस्पतालों के सामने मरीज पूरी तरह से निर्भर और जानकारी के अभाव में असहाय होता है। बीमारी और आपातकाल के समय मरीज या उसके तीमारदार के पास किसी उत्पाद की कीमत पर मोलभाव करने का न तो विकल्प होता है और न ही समय। इसी सूचनात्मक और सौदेबाजी की भारी असमानता के कारण अस्पतालों द्वारा दवाओं और कंज्यूमेबल्स पर कृत्रिम रूप से उच्च एमआरपी तय कराकर मनमाना मुनाफा कमाने की विकृत व्यवस्था फल-फूल रही है।

कैंसर दवाओं पर 700% और उपभोग्य सामग्रियों पर 1000% तक का मुनाफा: ट्रेड मार्जिन का खतरनाक खेल

सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गए आधिकारिक आंकड़ों ने निजी अस्पतालों के मुनाफे के सबसे बड़े खेल को बेनकाब कर दिया है। सरकार ने हलफनामे में स्वीकार किया कि अस्पताल अक्सर उन्हीं दवा निर्माताओं और वितरकों से दवाएं और चिकित्सा सामग्री खरीदना पसंद करते हैं, जो सबसे ज्यादा 'ट्रेड मार्जिन' की पेशकश करते हैं। इसके बाद इन दवाओं को मरीजों को उच्चतम एमआरपी पर बेचा जाता है। विशेष रूप से जीवन रक्षक एंटी-कैंसर दवाओं के मामले में यह ट्रेड मार्जिन 170 प्रतिशत से लेकर 700 प्रतिशत या उससे भी कहीं अधिक तक पहुंच जाता है। वहीं दूसरी तरफ, इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले मेडिकल कंज्यूमेबल्स जैसे सिरिंज, ग्लव्स, कैन्युला, कैथेटर और कॉटन आदि में 100 प्रतिशत से लेकर 1000 प्रतिशत से भी ज्यादा का मुनाफा कमाया जाना आम बात बन चुकी है। कम लागत में बनने वाले इन उत्पादों पर मनमाना एमआरपी अंकित करवाकर अस्पतालों द्वारा मरीजों पर थोपने की यह प्रवृत्ति अत्यंत अमानवीय और आर्थिक शोषण का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

935 फॉर्मूलेशन और 3881 दवाओं पर मूल्य सीमा तय: डॉ. कुलश्रेष्ठ की याचिका पर सरकार का जवाब

यह पूरा कानूनी घटनाक्रम डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया है। इस याचिका में नीति आयोग की चिंताजनक रिपोर्ट और पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के वर्ष 2020 के उस आधिकारिक बयान का हवाला दिया गया था, जिसमें बताया गया था कि अप्रत्याशित और महंगे स्वास्थ्य खर्चों (आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर) के कारण देश में हर साल करीब छह करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) जाने को मजबूर हो जाते हैं। याचिकाकर्ता ने सभी दवाओं और चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों पर अनिवार्य मूल्य कैपिंग की मांग उठाई थी। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने बताया कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) के माध्यम से अब तक 935 अनुसूचित फॉर्मूलेशन की अधिकतम कीमतें (सीलिंग प्राइस) तय की जा चुकी हैं और 3,881 नई दवाओं की खुदरा कीमतें नियंत्रित की गई हैं। सरकार ने दोहराया कि वह शेष आवश्यक दवाओं और मेडिकल उपभोग्य सामग्रियों पर भी ट्रेड मार्जिन को तर्कसंगत बनाने की दिशा में मसौदा तैयार कर रही है।

इलाज के खर्च से गरीबी के गर्त में जाने से बचेंगे परिवार: स्वास्थ्य सुधारों की नई रूपरेखा

केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिया गया यह हलफनामा देश के स्वास्थ्य तंत्र में एक बड़े सुधार का संकेत देता है। यदि सभी आवश्यक दवाओं, मेडिकल डिवाइसेज और उपभोग्य सामग्रियों के ट्रेड मार्जिन पर एक सख्त सीमा रेखा तय कर दी जाती है, तो निजी अस्पतालों द्वारा बनाए जाने वाले भारी-भरकम बिलों में 50 से 70 प्रतिशत तक की सीधी गिरावट आ सकती है। इससे न केवल गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को गंभीर बीमारियों के इलाज के दौरान अपनी जमीन-जायदाद और गहने बेचने की लाचारी से मुक्ति मिलेगी, बल्कि 'आयुष्मान भारत' जैसी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की प्रभावशीलता भी कई गुना बढ़ जाएगी। केंद्र सरकार द्वारा शीर्ष अदालत को दिए गए इस ठोस आश्वासन के बाद अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि नीति आयोग और स्वास्थ्य मंत्रालय मिलकर निजी अस्पतालों की इस खुली लूट पर कानूनी लगाम लगाने के लिए अंतिम अधिसूचना कब जारी करते हैं।