पूर्व चीफ जस्टिस गोपाल पराजुली को पुलिस ने थाने में बैठाया; प्रशासन बोला- सुरक्षा का था खतरा
पड़ोसी देश नेपाल की राजनीति और न्यायिक हलकों में उस वक्त बड़ा भूचाल आ गया जब देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) गोपाल पराजुली को पुलिस द्वारा अचानक पुलिस स्टेशन ले जाकर घंटों बैठाए रखने की खबर सामने आई। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के सार्वजनिक होते ही देश के विधिक समुदाय, बार एसोसिएशन, विपक्षी दलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सरकार और काठमांडू पुलिस प्रशासन के खिलाफ कड़ा मोर्चा खोल दिया। इस पूरे मामले को न्यायपालिका की गरिमा पर सीधा प्रहार और मनमानी पुलिसिया कार्रवाई करार दिया जाने लगा। हालांकि, बढ़ते जनआक्रोश और सियासी दबाव के बीच काठमांडू पुलिस ने एक स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश को न तो गिरफ्तार किया गया था और न ही उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज किया गया है। पुलिस का आधिकारिक दावा है कि उन पर स्थानीय लोगों के संभावित हमले और हिंसक विरोध के गंभीर खुफिया इनपुट थे, जिसके चलते उन्हें एहतियातन सुरक्षित रखने के लिए थाने लाया गया था।
क्या है पूरा मामला: संपत्ति विवाद और स्थानीय विरोध के बीच पुलिस की एंट्री
घटनाक्रम की शुरुआत काठमांडू घाटी के एक उपनगरीय इलाके से हुई, जहां पूर्व चीफ जस्टिस गोपाल पराजुली से जुड़े एक निर्माण स्थल और जमीन के सीमांकन को लेकर स्थानीय निवासियों के साथ पुराना विवाद चल रहा था। प्रत्यक्षदर्शियों और सूत्रों के मुताबिक, जिस वक्त पूर्व मुख्य न्यायाधीश उस विवादित स्थल पर कुछ काम की समीक्षा करने पहुंचे, वहां अचानक स्थानीय लोगों और प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ इकट्ठा होने लगी। भीड़ का रुख बेहद आक्रामक था और उन्होंने पूर्व चीफ जस्टिस के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।
हालात को बेकाबू होते देख मौके पर पहुंची स्थानीय पुलिस टीम ने गोपाल पराजुली को अपनी गाड़ी में बैठाया और सीधे नजदीकी पुलिस स्टेशन ले आई। हालांकि, थाने में उन्हें घंटों बैठाए रखने और उनके परिजनों व वकीलों से तुरंत संपर्क न होने देने की खबरों ने आग में घी का काम किया। कानूनी विशेषज्ञों ने सवाल उठाया कि अगर पुलिस का मकसद केवल सुरक्षा प्रदान करना था, तो उन्हें थाने के कमरे में बैठाने के बजाय उनके आधिकारिक या सुरक्षित निजी आवास पर क्यों नहीं पहुंचाया गया।
पुलिस का आधिकारिक रुख: 'गिरफ्तारी नहीं, यह केवल सुरक्षात्मक कदम था'
मामले के तूल पकड़ने के बाद काठमांडू जिला पुलिस रेंज के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बयान जारी किया। पुलिस प्रवक्ता ने दो-टूक कहा कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश को किसी भी तरह की कानूनी हिरासत या औपचारिक गिरफ्तारी में नहीं रखा गया था। पुलिस के अनुसार, उस वक्त घटनास्थल पर कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहद संवेदनशील हो चुकी थी। भीड़ की तरफ से पथराव या शारीरिक हमले की प्रबल आशंका थी।
प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यदि उस समय पुलिस हस्तक्षेप न करती तो कोई बड़ी अनहोनी हो सकती थी। पुलिस ने केवल 'सुरक्षात्मक निकासी' (प्रोटेक्टिव इवैक्युएशन) के तहत उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया था। अधिकारियों ने बताया कि जैसे ही घटनास्थल पर तनाव शांत हुआ और इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर स्थिति सामान्य की गई, उसके बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश को पूरे सम्मान और सुरक्षा के साथ उनके घर भेज दिया गया।
नेपाल के न्यायिक हलकों में तीखा आक्रोश, जांच की उठी मांग
पुलिस की इस दलील के बावजूद नेपाल सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और वरिष्ठ अधिवक्ताओं का गुस्सा शांत नहीं हुआ है। बार एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने इस घटना को अत्यंत चिंताजनक और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर रह चुके व्यक्ति के साथ इस तरह का व्यवहार कानून के शासन के लिए खतरनाक मिसाल है।
नेपाल के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोपाल पराजुली का कार्यकाल भी पहले काफी चर्चाओं और विवादों में रहा था, विशेषकर उनके जन्म प्रमाण पत्र, शैक्षणिक योग्यता और नागरिकता के दस्तावेजों से जुड़े विवाद के चलते उन्हें अपने पद से हटना पड़ा था। ऐसे में इस ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर पुरानी राजनीतिक रंजिशों और न्यायिक स्वतंत्रता पर नई बहस को जन्म दे दिया है। नागरिक अधिकार संगठनों ने गृह मंत्रालय से इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कराने और सुरक्षा के नाम पर किसी नागरिक या पूर्व संवैधानिक पदधारक को बेवजह थाने में बैठाए जाने के प्रोटोकॉल पर स्पष्ट रिपोर्ट तलब करने की मांग की है।