आरक्षित सीटों के रोटेशन की मांग वाली याचिका पर बोले CJI सूर्यकांत; सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हम संसद का तीसरा सदन नहीं

आरक्षित सीटों के रोटेशन की मांग वाली याचिका पर बोले CJI सूर्यकांत; सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हम संसद का तीसरा सदन नहीं

नई दिल्ली: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में दशकों से अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों में रोटेशन प्रणाली लागू करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे याचिकाकर्ता को अदालत से कोई राहत नहीं मिली। प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने याचिका पर हस्तक्षेप करने से साफ इनकार करते हुए इसे खारिज कर दिया।

सुनवाई के दौरान देश के मौजूदा सियासी माहौल और आंदोलनों का संदर्भ देते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने हल्के-फुल्के अंदाज में याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि राहत पाने के लिए वे गलत जगह आ गए हैं, उन्हें अदालत के बजाय धरना-प्रदर्शन करना चाहिए। अदालत ने सख्त लहजे में यह भी स्पष्ट किया कि आरक्षण और परिसीमन से जुड़े कानून बनाना व उनमें बदलाव करना संसद और विधायिका का अधिकार क्षेत्र है, न्यायपालिका संसद के 'तीसरे सदन' की भूमिका नहीं निभा सकती।

'आप गलत नंबर मिला रहे हैं, यह आंदोलन का दौर है': CJI की चुटकी

सुनवाई की शुरुआत में जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलीलें रखनी शुरू कीं, तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने मजाकिया लहजे में टिप्पणी की:

"आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं। आजकल तो विरोध-प्रदर्शनों और धरने का दौर चल रहा है। शायद आपको भी कोर्ट आने के बजाय वही करना चाहिए।"

इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने हाथ जोड़ते हुए कहा कि उनका प्रदर्शन करने का कोई इरादा नहीं है और मौसम की वजह से उनका गला भी खराब है।

इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने आगे कहा:

"आप निश्चित तौर पर अपनी आवाज उठा सकते हैं। यह तर्क दे सकते हैं कि संसद के लिए इस मुद्दे पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है। लेकिन यह काम केवल विधायिका ही कर सकती है, न्यायपालिका नहीं।"

क्या थी याचिका? सुल्तानपुर की कादीपुर सीट का दिया गया था हवाला

यह याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट के मतदाता जगदीश सिंह द्वारा दाखिल की गई थी।

  • 7 दशकों से एक ही वर्ग के लिए आरक्षित: याचिकाकर्ता ने दलील दी कि कादीपुर विधानसभा सीट 1952 के पहले आम चुनाव से लेकर आज तक (सात दशकों से अधिक समय से) लगातार अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित रखी गई है।

  • चार-पांच परिवारों को ही लाभ: याचिका में आरोप लगाया गया कि रोटेशन न होने की वजह से इस क्षेत्र के केवल चार या पांच प्रभावशाली परिवारों को ही बारी-बारी से राजनीतिक लाभ मिलता रहा है।

  • मौलिक अधिकारों के हनन का तर्क: वकील ने दावा किया कि रोटेशन लागू न होने से संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 और 19 का उल्लंघन होता है, क्योंकि सामान्य वर्ग और अन्य समुदायों के मतदाताओं के पास अपने क्षेत्र से चुनाव लड़ने या अपनी पसंद का उम्मीदवार चुनने के विकल्प सीमित हो जाते हैं।

'हम संसद का तीसरा सदन नहीं बन सकते': जस्टिस बागची की दो-टूक

याचिकाकर्ता के वकील ने स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों का हवाला देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T के तहत पंचायतों और नगर पालिकाओं में आरक्षित सीटों के रोटेशन की व्यवस्था लागू है, इसलिए विधानसभा और लोकसभा में भी ऐसी ही व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।

इस पर पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया:

  • स्थानीय निकाय और विधायिका का ढांचा अलग: जस्टिस बागची ने कहा कि स्थानीय स्वशासन और विधानसभा-संसद के चुनाव अलग-अलग संवैधानिक व्यवस्थाओं के तहत संचालित होते हैं। अदालत अपनी मर्जी से संविधान या कानूनी प्रावधानों को दोबारा नहीं लिख सकती।

  • तीसरे सदन की भूमिका से इनकार: अदालत ने कहा कि न्यायिक समीक्षा का दायरा केवल यह देखना है कि क्या कोई कानून स्पष्ट रूप से मनमाना है। अदालत संसद का तीसरा सदन बनकर नए चुनावी नियम तय नहीं कर सकती।

'वोटिंग का अधिकार अक्षुण्ण, पार्टी विचारधारा पर होता है मतदान'

पीठ ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को भी पूरी तरह खारिज कर दिया कि सीट आरक्षित होने से सामान्य वर्ग के मतदाताओं के अधिकार छिन जाते हैं:

  1. वोट का अधिकार प्रभावित नहीं: अदालत ने कहा कि सीट आरक्षित होने के बावजूद हर नागरिक का मतदान का अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहता है। मतदाता अपनी पसंद के किसी भी उम्मीदवार को वोट दे सकता है।

  2. जाति आधारित वोटिंग की बाध्यता नहीं: जस्टिस बागची ने कहा कि यह मान लेना कानूनी रूप से गलत है कि बहुसंख्यक समाज केवल अपनी ही जाति के उम्मीदवार को वोट देना चाहता है। एक परिपक्व लोकतंत्र में मतदाता व्यक्ति या जाति के बजाय राजनीतिक दल और उसकी नीतियों व विचारधारा को देखकर मतदान करते हैं।

  3. चुनाव लड़ने की आजादी: पीठ ने रेखांकित किया कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवार का चुनाव लड़ने का अधिकार केवल एक सीट तक सीमित नहीं है; वह राज्य के किसी भी अन्य अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिसीमन (Delimitation) एक निश्चित अंतराल पर कानून के अनुसार होने वाली प्रक्रिया है, जिसे लगातार चलने वाली प्रक्रिया नहीं बनाया जा सकता। इन टिप्पणियों के साथ शीर्ष अदालत ने याचिका पर किसी भी प्रकार का न्यायिक निर्देश जारी करने से इनकार करते हुए मामले का पटाक्षेप कर दिया।