'भारत के 95 फीसदी लोगों के सिर में गोबर भरा है, वोट देने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए': सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू का विवादित बयान

'भारत के 95 फीसदी लोगों के सिर में गोबर भरा है, वोट देने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए': सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू का विवादित बयान

नई दिल्ली: अपने बेबाक और अक्सर विवादित बयानों के लिए चर्चित रहने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने एक बार फिर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और मतदाताओं को लेकर बेहद विवादित टिप्पणी की है। एक यूट्यूब चैनल को दिए साक्षात्कार में पूर्व जस्टिस काटजू ने दावा किया कि भारत के 95 फीसदी मतदाताओं के दिमाग में 'गोबर भरा हुआ है' और वे केवल जाति व धर्म के आधार पर मतदान करते हैं, इसलिए उन्हें वोट देने का अधिकार ही नहीं मिलना चाहिए।

काटजू ने देश में चल रहे 'वोट चोरी' और चुनाव आयोग विरोधी अभियानों पर भी तंज कसते हुए कहा कि जब लोग उम्मीदवार की योग्यता देखे बिना वोट डालते हैं, तो ऐसे में लोकतंत्र का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

'95 फीसदी लोग मेरिट नहीं देखते, भेड़-बकरियों की तरह डालते हैं वोट'

साक्षात्कार के दौरान पूर्व न्यायाधीश काटजू ने कहा कि भारतीय मतदाता महंगाई, बेरोजगारी या बुनियादी विकास जैसे वास्तविक मुद्दों पर फैसला लेने के बजाय जातिवाद और संप्रदायिकता के जाल में फंसकर मतदान करते हैं।

जस्टिस काटजू ने कहा:

"मुझसे जब वोट चोरी पर सवाल पूछा गया, तो मैंने कहा कि और वोट चोरी होनी चाहिए। तुम लोग वोट देने लायक ही नहीं हो। 95 फीसदी वोटर उम्मीदवार का गुण-दोष (मेरिट) नहीं देखते, वे केवल जाति और बिरादरी पर वोट डालते हैं। तुम वोट डालने के लायक हो? तुम लोगों के खोपड़े में गोबर भरा है—95 फीसदी लोगों के दिमाग में। ऐसे लोगों को वोट देने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। मैं तो कहता हूं कि 90 फीसदी वोटर वोट देने के लायक ही नहीं हैं।"

उन्होंने यह भी कहा कि वे पिछले महीने ही 80 वर्ष के हुए हैं और उन्होंने अपने पूरे जीवन में न कभी वोट दिया है और न कभी देंगे, क्योंकि वे इस प्रक्रिया को व्यर्थ मानते हैं।

'लोकतंत्र भारत का सबसे बड़ा दुश्मन': मॉडर्न माइंडेड डिक्टेटरशिप की वकालत

पूर्व जज ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मौजूदा चुनावी लोकतंत्र भारत की तरक्की में सबसे बड़ी बाधा बन चुका है।

  • सांप्रदायिकता और जातिवाद को बढ़ावा: उन्होंने तर्क दिया कि देश में साल भर कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं और राजनीतिक दल वोटों के ध्रुवीकरण के लिए हिंदू-मुस्लिम नफरत और जातिगत वैमनस्य फैलाते हैं। उनका दावा था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था इन सामंती कुरीतियों को खत्म करने के बजाय और मजबूत करती है।

  • मुस्तफा कमाल अतातुर्क का उदाहरण: काटजू ने कहा कि भारत को प्रगतिशील बनाने के लिए एक 'आधुनिक सोच वाले तानाशाह' (Modern-minded Dictatorship) की जरूरत है। उन्होंने तुर्की के आधुनिक निर्माता मुस्तफा कमाल पाशा का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह उन्होंने कट्टरपंथ को खत्म कर देश का आधुनिकीकरण किया, उसी तरह भारत को भी कड़े फैसलों और वैचारिक अनुशासन की आवश्यकता है।

सीजेपी प्रोटेस्ट और पीस बॉन्ड पर भी उठाए सवाल

मतदाता सूची संशोधन और चुनाव आयोग के खिलाफ हाल ही में आंदोलन करने वाले छात्र संगठनों व एक्टिविस्ट्स पर भी काटजू ने तीखा रुख अपनाया।

  • उन्होंने अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका जैसे एक्टिविस्ट्स द्वारा पुलिस के सामने 'पीस बॉन्ड' (शांति मुचलका) भरने की आलोचना की।

  • काटजू ने कहा कि इतिहास गवाह है कि जब कोई आंदोलनकारी माफी मांगता है या बॉन्ड भरता है, तो उसका राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन वहीं समाप्त हो जाता है। उन्होंने दावा किया कि इस कदम से आंदोलन की रीढ़ टूट गई है।

कानूनी व राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया

जस्टिस काटजू के इस बयान के सामने आने के बाद राजनीतिक दलों, कानूनविदों और नागरिक समाज में तीव्र आक्रोश देखा जा रहा है। संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का संविधान हर वयस्क नागरिक को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Suffrage) की गारंटी देता है, जो लोकतंत्र की आधारशिला है। मतदाताओं को 'अयोग्य' या अपमानजनक शब्दों से संबोधित करना देश के संविधान और करोड़ों नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का खुला अनादर है। पूर्व न्यायाधीश के इस बयान को लेकर सोशल मीडिया और मीडिया मंचों पर तीखी बहस छिड़ गई है।