योगी-अखिलेश ही नहीं, मायावती और मुलायम भी बिना विधानसभा लड़े बने थे सीएम: अखिलेश यादव का 2027 के लिए बड़ा दांव

योगी-अखिलेश ही नहीं, मायावती और मुलायम भी बिना विधानसभा लड़े बने थे सीएम: अखिलेश यादव का 2027 के लिए बड़ा दांव

लखनऊ/वाराणसी: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचलें अभी से तेज हो गई हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कन्नौज से लोकसभा सांसद अखिलेश यादव ने वाराणसी में पत्रकारों से बातचीत के दौरान एक ऐसा बयान दिया, जिसने पूरे प्रदेश के सियासी गलियारों में बहस छेड़ दी है। वाराणसी की किसी सीट से चुनाव लड़ने के सवाल पर अखिलेश यादव ने दो-टूक कहा कि वे विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे, बल्कि 2012 की तरह सांसद रहते हुए सीधे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।

अखिलेश ने मुस्कुराते हुए कहा, "हम मुख्यमंत्री तभी बनते हैं जब चुनाव नहीं लड़ते हैं, इसलिए वही करेंगे जो हमारे लिए शुभ है। हमें शुभ और खराब समय का ज्ञान है।"

सपा प्रमुख के इस बयान के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या चुनाव न लड़ना अखिलेश यादव का कोई नया राजनीतिक टोटका है या फिर इसके पीछे कोई गहरी चुनावी रणनीति छिपी है? हालांकि, उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास गवाह है कि अखिलेश यादव अकेले ऐसे नेता नहीं हैं; मुलायम सिंह यादव, मायावती और खुद मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पहली बार बिना विधानसभा चुनाव लड़े ही सूबे की सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे थे।

1. यूपी में 'बिना लड़े सीएम' बनने का 35 साल पुराना सियासी इतिहास

उत्तर प्रदेश में द्विसदनीय (Bicameral) विधायिका है, जिसमें विधानसभा के साथ-साथ विधान परिषद (Legislative Council) भी है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत कोई भी व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य बने भी मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकता है, बशर्ते उसे 6 महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद में से किसी एक की सदस्यता हासिल करनी हो। यूपी के इतिहास में इसका कई बार इस्तेमाल हुआ है:

  • मुलायम सिंह यादव (1989): सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव जब 1989 में पहली बार जनता दल की सरकार में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तब वे विधान परिषद के सदस्य (MLC) थे। बाद में उन्होंने विधानसभा का रुख किया।

  • मायावती (2007): बसपा सुप्रीमो मायावती ने जब 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के दम पर उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की ऐतिहासिक सरकार बनाई, तब उन्होंने खुद विधानसभा का कोई चुनाव नहीं लड़ा था। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद वे विधान परिषद (उच्च सदन) की सदस्य बनीं।

  • अखिलेश यादव (2012): 2012 में जब समाजवादी पार्टी ने अपने दम पर 224 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया, तब 38 वर्षीय अखिलेश यादव कन्नौज से लोकसभा सांसद थे। उन्होंने पूरे प्रदेश में साइकिल यात्रा और रैलियां कर पार्टी को जीत दिलाई, लेकिन खुद विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा देकर विधान परिषद की राह चुनी।

  • योगी आदित्यनाथ (2017): 2017 में जब भाजपा ने 300 से अधिक सीटें जीतकर प्रचंड जीत दर्ज की, तब गोरखपुर से पांच बार के सांसद योगी आदित्यनाथ को पार्टी ने मुख्यमंत्री की कमान सौंपी। योगी ने भी अपना पहला 5 साल का कार्यकाल (2017-2022) विधान परिषद सदस्य (MLC) के रूप में ही पूरा किया। वे 2022 में पहली बार गोरखपुर शहर सीट से विधानसभा चुनाव लड़े।

2. पड़ोसी राज्य बिहार में नीतीश कुमार का चर्चित मॉडल

सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, पड़ोसी राज्य बिहार में भी यह मॉडल पिछले दो दशकों से सफलतापूर्वक आजमाया जा रहा है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वर्ष 2005 से लगातार सूबे की बागडोर संभाल रहे हैं, लेकिन उन्होंने दो दशकों से विधानसभा का कोई चुनाव नहीं लड़ा। वे हर बार विधान परिषद (MLC) के रास्ते ही सदन के सदस्य बनकर मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते रहे हैं।

3. चुनाव न लड़ना: राजनीतिक रणनीति या 'शुभ-अशुभ' का टोटका?

अखिलेश यादव के इस बयान के दो पहलू हैं—एक व्यावहारिक रणनीति और दूसरा प्रतीकात्मक टोटका:

रणनीति के पक्ष में तर्क (403 सीटों पर फोकस):

  • एक सीट पर बंधने से बचाव: जब किसी पार्टी का सर्वोच्च नेता खुद किसी विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनता है, तो उसे नामांकन, प्रचार और स्थानीय प्रबंधन के लिए अपनी सीट पर काफी समय और ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है।

  • स्टार प्रचारक की पूरी आजादी: 2012 में अखिलेश यादव ने पूरे प्रदेश में आक्रामक प्रचार किया था क्योंकि वे किसी सीट से बंधे नहीं थे। 2027 में भी यदि वे खुद मैदान में नहीं उतरते हैं, तो वे प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशियों के पक्ष में पूरी ताकत झोंक सकेंगे और गठबंधन के साथियों के साथ बेहतर समन्वय बना सकेंगे।

  • सांसद पद सुरक्षित: अखिलेश वर्तमान में कन्नौज से लोकसभा सांसद और संसद में सपा संसदीय दल के नेता हैं। चुनाव न लड़ने की स्थिति में उनकी संसद सदस्यता पर कोई खतरा नहीं रहेगा; सरकार बनने की स्थिति में ही वे केंद्र की राजनीति छोड़कर यूपी की कमान संभालेंगे।

टोटके और संयोग के पक्ष में तर्क:

  • यूपी की राजनीति में पिछले तीन दशकों का एक दिलचस्प संयोग रहा है। 2007 (बसपा), 2012 (सपा) और 2017 (भाजपा)—इन तीनों ही बार जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत मिला, तो बनने वाले मुख्यमंत्री (मायावती, अखिलेश, योगी) ने चुनाव नहीं लड़ा था।

  • वहीं 2022 में जब अखिलेश यादव ने करहल से और योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर से सीधे विधानसभा चुनाव लड़ा, तो सत्ताधारी दल (भाजपा) की सीटें 312 से घटकर 255 पर आ गईं और सपा 111 सीटों पर ही सिमट गई। अखिलेश का 'शुभ' वाला बयान इसी संयोग की ओर इशारा करता है।

4. विरोधियों का पलटवार: 'मैदान छोड़कर भाग रहे हैं अखिलेश'

अखिलेश यादव के इस बयान पर एनडीए के घटक दलों और भाजपा ने तीखा हमला बोला है।

  • सुभासपा प्रमुख और कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए लिखा, "वह नेता ही क्या जो चुनाव से भागे? हमको नहीं पता था कि आप इतने टोना-टोटका मानने वाले हैं। 2012 में आप रेडीमेड पार्टी के रेडीमेड शहजादे होने के कारण सीएम बने थे। अब जब लगा कि जमीन खिसक चुकी है, तो मैदान छोड़कर भागने लगे।"

  • भाजपा नेताओं ने भी याद दिलाया कि सपा सरकार के दौरान नोएडा जाने पर कुर्सी चले जाने का अंधविश्वास चलता था, जिसे सीएम योगी आदित्यनाथ ने बार-बार नोएडा जाकर तोड़ा। भाजपा का कहना है कि अखिलेश हार के डर से बचने के लिए 'शुभ-अशुभ' का बहाना बना रहे हैं।

अखिलेश यादव का यह बयान चाहे राजनीतिक चुटकी हो, मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की चाल हो या 403 सीटों पर फ्री-हैंड प्रचार की सोची-समझी रणनीति—इसने यह साफ कर दिया है कि 2027 की चुनावी बिसात पर समाजवादी पार्टी अपने 2012 वाले आक्रामक और केंद्रित मॉडल को ही दोहराने के मूड में है।