UNSC में वीटो पर भारत का दो टूक रुख: 'सभी स्थाई सदस्यों को मिले वीटो या किसी को नहीं', राजदूत ने आंकड़े गिनाकर P5 को घेरा
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में लंबे समय से लंबित व्यापक सुधारों को लेकर भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के मंच से दुनिया के सामने अपना मजबूत और सैद्धांतिक रुख दोहराया है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि राजदूत पी. हरीश (Parvathaneni Harish) ने स्पष्ट किया कि जब तक सुरक्षा परिषद में वीटो (Veto) का अधिकार अस्तित्व में है, तब तक पुनर्गठित परिषद के सभी स्थाई सदस्यों को वीटो पावर मिलना अनिवार्य है।
भारत ने अफ्रीकी देशों की साझा स्थिति (Common African Position) का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि न्याय और निष्पक्षता का तकाजा यही है कि सभी स्थाई सदस्यों को एक समान अधिकार, शक्तियां और जिम्मेदारियां दी जाएं। बिना वीटो के नए स्थाई सदस्यों की श्रेणी बनाना वैश्विक असमानता को दूर करने के बजाय उसे और गहरा करने जैसा होगा।
आंकड़े गिनाकर खोली P5 के एकाधिकार की पोल
संबोधन के दौरान भारतीय दूत ने ऐतिहासिक आंकड़े सामने रखते हुए सुरक्षा परिषद के मौजूदा पांच स्थाई सदस्यों (P5—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस) के वीटो के दुरुपयोग पर तीखा प्रहार किया:
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331 बार वीटो का इस्तेमाल: यूएन के अस्तित्व में आने के बाद से अब तक करीब 200 प्रस्तावों पर कुल 331 बार वीटो शक्ति का इस्तेमाल किया जा चुका है।
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केवल 3 देशों का दबदबा: पिछले साढ़े तीन दशकों (35 वर्षों से अधिक) के दौरान P5 के दो देशों (ब्रिटेन और फ्रांस) ने एक बार भी वीटो का इस्तेमाल नहीं किया है। अधिकांश वीटो या वीटो की धमकियां केवल बाकी के तीन स्थाई सदस्यों की ओर से आई हैं।
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संकुचित राजनीतिक लाभ का औजार: राजदूत हरीश ने कहा कि वीटो को वैश्विक शांति के बजाय संकीर्ण भू-राजनीतिक हितों (Narrow Political Expediency) को साधने का साधन बना दिया गया है।
2022 का 'वीटो इनिशिएटिव' भी साबित हुआ बेअसर
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 2022 में पारित प्रस्ताव 76/262 (Veto Initiative) का हवाला देते हुए भारत ने कहा कि इस नियम के तहत यह अनिवार्य किया गया था कि जब भी कोई स्थाई सदस्य वीटो करेगा, तो उसे महासभा में आकर जवाब देना होगा। इसे एक बड़े सुधार के रूप में प्रचारित किया गया था।
हालांकि, जमीनी हकीकत का ब्योरा देते हुए राजदूत ने कहा कि इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद भी गाजा, यूक्रेन और अन्य वैश्विक संकटों पर वीटो की झड़ी लग गई, जिससे साबित होता है कि 'टुकड़ों-टुकड़ों में किए जाने वाले छोटे-मोटे सुधार' (Piecemeal Reforms) पूरी तरह विफल साबित हुए हैं।
'बिना वीटो नई सदस्यता यानी दोयम दर्जे का सदस्य बनाना'
भारत ने उन प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें नए देशों को बिना वीटो के लंबे समय के लिए स्थाई सदस्य बनाने की बात कही जाती है। भारत ने तर्क दिया कि:
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ऐसी व्यवस्था केवल 'दोयम दर्जे के सदस्य' (Second-Class Members) तैयार करेगी और P5 के एकाधिकार के ढांचे में कोई वास्तविक बदलाव नहीं ला पाएगी।
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आवधिक चुनाव (Periodic Elections) और स्थायी सदस्यता (Permanency) की अवधारणाएं एक-दूसरे के पूरी तरह विपरीत हैं, इसलिए अर्द्ध-स्थाई श्रेणियों से मुख्य समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
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सुरक्षा परिषद को 1945 के द्वितीय विश्व युद्ध के नतीजों से बाहर निकलकर आज के 21वीं सदी के वैश्विक यथार्थ को प्रतिबिंबित करना होगा।
पांचों पैमानों पर एक साथ टेक्स्ट-बेस्ड बातचीत की मांग
भारत ने स्पष्ट किया कि वीटो के मुद्दे को परिषद के विस्तार, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, सदस्यता की श्रेणियों और कार्यप्रणाली से अलग करके नहीं देखा जा सकता। सुरक्षा परिषद के सुधार के सभी पांचों स्तंभों पर एक साथ टेक्स्ट-बेस्ड नेगोशिएशन (Text-Based Negotiations) शुरू किए जाने चाहिए, जिसकी एक तय समयसीमा और निश्चित लक्ष्य हो।
भारत के इस आक्रामक और तार्किक रुख ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह जी-4 (भारत, ब्राजील, जर्मनी, जापान) और ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर सुरक्षा परिषद में बराबरी के हक के लिए अपनी कूटनीतिक लड़ाई को निर्णायक मुकाम तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है।