धरी की धरी रह गई आसिम मुनीर की चालाकी? 'इस्लामिक नाटो' भी फुस्स! अब बैकफुट पर आ ईरान के दरवाजे क्यों पहुंची मुस्लिम तिकड़ी
मिडिल ईस्ट के रण में कुछ ही दिन पहले तक सऊदी अरब की हिफाजत के नाम पर फाइटर जेट्स और 8,000 सैनिकों की फौज भेजने की हुंकार भरने वाले पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल/जनरल आसिम मुनीर की पूरी रणनीति औंधे मुंह गिरती नजर आ रही है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए ने मिलकर जिस तथाकथित 'इस्लामिक नाटो' (त्रिपक्षीय रक्षा समझौते) के जरिए यमन के हूती विद्रोहियों को आंखें दिखाने की कोशिश की थी, जमीनी हकीकत सामने आते ही वह धुआं साबित हो गया। हूतियों द्वारा सैन्य दबाव के आगे झुकने के बजाय हमलों की धार और तेज करने की सीधी चेतावनी के बाद अब यह पूरी मुस्लिम तिकड़ी बंदूकों के दम पर नहीं, बल्कि कूटनीतिक दूत भेजकर ईरान के दरवाजे पर दस्तक देने को मजबूर हो गई है।
आसिम मुनीर की क्या थी चालाकी और क्यों हुआ दांव उलटा?
जनरल आसिम मुनीर इस सैन्य दखल के जरिए एक तीर से तीन बड़े शिकार करना चाहते थे:
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सऊदी खजाने से आर्थिक संजीवनी: कंगाली की कगार पर खड़े पाकिस्तान को सऊदी अरब से कई अरब डॉलर के नए बेलआउट पैकेज और तेल गारंटी दिलवाना।
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खुद को मुस्लिम जगत का 'कमांडर' साबित करना: परमाणु संपन्न पाकिस्तानी सेना को अरब देशों की सुरक्षा का इकलौता मसीहा बनाकर पेश करना और इस्लामाबाद का दबदबा बढ़ाना।
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घरेलू राजनीतिक संकट से ध्यान भटकाना: पाकिस्तान के भीतर बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) व BLA के रोज होते हमलों से जनता की नजरें हटाकर मिडिल ईस्ट की 'पवित्र रक्षा' का नैरेटिव गढ़ना।
लेकिन यह चालाकी तब धरी की धरी रह गई जब हूतियों ने साफ कर दिया कि सऊदी की सीमा पर पाकिस्तानी लड़ाकू विमान खड़े हों या मिसाइल डिफेंस, उनके ड्रोन और सटीक बैलिस्टिक मिसाइलें न तो रुकेंगी और न ही वे किसी बाहरी सेना के डर से झुकेंगे।
हूतियों की दो टूक धमकी और पाकिस्तान में घबराहट
यमन की अंसारुल्लाह (हूती) लीडरशिप ने खुले मंच से चेतावनी दी कि यदि पाकिस्तान के जेएफ-17 विमानों या सैनिकों ने यमन की दिशा में कोई आक्रामक कार्रवाई की, तो वे इसे सीधे जंग का ऐलान मानेंगे। इस स्थिति में लाल सागर में पाकिस्तानी जहाजों, कराची से होने वाले तेल व्यापार और खाड़ी में काम कर रहे लाखों पाकिस्तानी कामगारों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
इसके साथ ही, पाकिस्तान के अपने पश्चिमी बॉर्डर (ईरान-पाकिस्तान सीमा) पर बलूच विद्रोही पहले से सक्रिय हैं। यदि तेहरान नाराज होता है, तो पाकिस्तान के लिए अपनी ही 900 किलोमीटर लंबी पश्चिमी सीमा को संभालना असंभव हो जाएगा। इस जमीनी खतरे ने रावलपिंडी (पाकिस्तानी सैन्य मुख्यालय) के पसीने छुड़ा दिए।
तेहरान के दरवाजे पर क्यों पहुंचे सऊदी, तुर्किए और पाकिस्तान?
जब सैन्य धौंस काम नहीं आई, तो तिकड़ी को यह समझ आ गया कि हूती संकट की चाबी केवल और केवल ईरान के पास है।
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सैन्य समाधान असंभव: दशक भर चले यमन युद्ध में सऊदी अरब और यूएई खरबों डॉलर के अमेरिकी और पश्चिमी हथियार झोंकने के बाद भी हूतियों को नहीं हरा सके थे। ऐसे में पाकिस्तान की सीमित सैन्य टुकड़ी कोई बड़ा उलटफेर नहीं कर सकती थी।
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चीनी मध्यस्थता वाले बीजिंग समझौते की साख: सऊदी अरब अच्छी तरह जानता है कि 2023 में चीन की मध्यस्थता से ईरान के साथ जो ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ था, अगर वह टूटा, तो सऊदी का अरबों डॉलर का 'विजन 2030' और नियोम मेगा-प्रोजेक्ट सबसे पहले बर्बाद होगा।
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तुर्किए की दोहरी नीति: तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगन बयानबाजी तो आक्रामक करते हैं, लेकिन वे भी सीधे तौर पर शिया-सुन्नी सैन्य टकराव या ईरान से सीधे युद्ध का जोखिम उठाने को कतई तैयार नहीं हैं।
यही वजह है कि बंद कमरों की गुप्त बैठकों और विशेष दूतों के जरिए अब तेहरान को यह आश्वस्त करने की कोशिश की जा रही है कि सऊदी में सैनिकों की मौजूदगी सिर्फ रक्षात्मक है और वे ईरान के हितों पर हमला नहीं करेंगे। बदले में तेहरान से गुजारिश की जा रही है कि वह हूतियों को सऊदी शहरों और तेल कुओं पर बड़े हमले रोकने के लिए राजी करे।
'इस्लामिक नाटो' का कागजी भ्रम टूटा
यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर यह साबित करता है कि जब तक क्षेत्रीय भू-राजनीति में ईरान और उसके समर्थित गुटों के बुनियादी सरोकारों (जैसे गाजा संकट और पश्चिमी हस्तक्षेप) का राजनीतिक समाधान नहीं निकलता, तब तक किसी भी 'इस्लामिक नाटो' या दिखावटी सैन्य मोर्चेबंदी से खाड़ी में स्थायी शांति संभव नहीं है। जनरल आसिम मुनीर की सेना किराए पर देकर कूटनीतिक बाजीगरी करने की कोशिश ने पाकिस्तान को खाड़ी की खतरनाक आग के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से सम्मानजनक वापसी का इकलौता रास्ता अब तेहरान की मान-मनौव्वल ही बचा है।