देवउठनी एकादशी पर भद्रा का साया, जानिए क्या बदलेंगे पूजा और तुलसी विवाह के नियम तथा शुभ मुहूर्त
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को सनातन परंपरा में देवउठनी, प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी के नाम से जाना जाता है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से क्षीरसागर में योगनिद्रा में लीन भगवान श्रीहरि विष्णु पूरे चार महीने यानी चातुर्मास की अवधि समाप्त होने के बाद इसी पावन तिथि पर जागते हैं। जगत के पालनहार के जागते ही संसार भर में चार माह से रुके हुए सभी मांगलिक और शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और नामकरण विधिवत प्रारंभ हो जाते हैं। इस दिन घरों और मंदिरों में भगवान शालिग्राम और माता तुलसी के विवाह का भव्य आयोजन होता है। हालांकि जब इस महापुण्यकारी तिथि पर ज्योतिषीय गणना के अनुसार भद्रा का साया पड़ता है, तो आम श्रद्धालुओं के मन में यह भारी असमंजस पैदा हो जाता है कि क्या भद्रा काल में भगवान को जगाने की पूजा और तुलसी विवाह के मांगलिक अनुष्ठान किए जा सकते हैं या इसके लिए मुहूर्त और पूजा के नियमों में कोई विशेष बदलाव करना पड़ेगा।
ज्योतिष शास्त्र में भद्रा की स्थिति और इसके प्रभाव का वास्तविक रहस्य
वैदिक ज्योतिष के अनुसार भद्रा को सूर्य देव की पुत्री और शनि देव की बहन माना गया है, जिनका स्वभाव स्वभावतः उग्र और विघ्नकारक माना जाता है। पंचांग के विष्टि करण को ही भद्रा कहा जाता है। सामान्यतः शुभ और मांगलिक कार्यों—जैसे विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, व्यापार का शुभारंभ या नए वस्त्र-आभूषण धारण करने में भद्रा का सर्वथा त्याग करने का सख्त शास्त्रीय नियम है। परंतु ज्योतिष शास्त्र का यह भी सुस्पष्ट सिद्धांत है कि भद्रा का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस लोक में वास कर रही है। जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन राशि में होता है, तब भद्रा का वास स्वर्गलोक में माना जाता है। जब चंद्रमा मेष, वृषभ, मिथुन या वृश्चिक में होता है, तब पाताल लोक में भद्रा का वास होता है। केवल जब चंद्रमा कन्या, तुला, धनु या मकर राशि में संचार करता है, तभी भद्रा मृत्युलोक यानी पृथ्वी पर प्रभावी होती है। शास्त्रों का स्पष्ट मत है कि स्वर्ग और पाताल लोक में वास करने वाली भद्रा पृथ्वीवासियों के लिए अशुभ फलदायी नहीं होती, बल्कि वह शुभ कार्यों में साधक का कल्याण ही करती है।
क्या भद्रा के दौरान बदल जाएंगे देवउठनी एकादशी की पूजा के नियम
भद्रा का साया होने पर भी एकादशी व्रत के नित्य पूजन और भगवान विष्णु की आराधना में कोई बड़ा व्यवधान नहीं आता, क्योंकि नित्य देव पूजा, मानसिक जप, व्रत का संकल्प और स्तोत्र पाठ किसी भी काल में वर्जित नहीं माने गए हैं। देवउठनी एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान, भगवान नारायण के निमित्त व्रत का संकल्प और सत्यनारायण कथा के श्रवण पर भद्रा का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। यदि भद्रा का समय दिन में चल रहा हो, तो भी आप सामान्य रूप से धूप, दीप, चंदन, तुलसीदल और फलों से भगवान विष्णु का पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन संपन्न कर सकते हैं। केवल यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि भद्रा पृथ्वी लोक की हो, तो उस समयावधि के भीतर तुलसी विवाह की मुख्य वैवाहिक रस्में—जैसे फेरे, कन्यादान और विवाह की लगन वेदी के कर्मकांड करने से बचना चाहिए और भद्रा की समाप्ति के पश्चात ही वैवाहिक रस्में पूरी करनी चाहिए।
भगवान विष्णु को योगनिद्रा से जगाने की सही शास्त्रीय विधि
देवउठनी एकादशी की संध्या को आंगन में चूने और गेरू से सुंदर चौक पूरकर भगवान के चरणों के चिह्न बनाए जाते हैं, जिसे 'भगवान के पगले' कहा जाता है। इसके पश्चात गन्ने का भव्य मंडप तैयार किया जाता है और उसके भीतर भगवान शालिग्राम और तुलसी जी को विराजमान कराया जाता है। ऋतु फल जैसे सिंघाड़ा, शकरकंद, अमरूद, बेर और नया गुड़ भगवान को अर्पित किया जाता है। रात्रि के समय परिवार के सभी सदस्य मिलकर थाली या घंटी बजाते हुए पारंपरिक मंगलगान गाते हैं और 'उठो देव, बैठो देव, पांवलिया चटकाओ देव' कहकर प्रभु को योगनिद्रा से जगाते हैं। भद्रा का विचार करते हुए यह ध्यान रखा जाता है कि भगवान को जगाने का यह पावन कर्म और दीपदान का अनुष्ठान शाम के प्रदोष काल या भद्रा समाप्ति के उपरांत गोधूलि वेला में करना सर्वोत्तम और अत्यंत फलदायी माना जाता है।
तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त और पूजा में बरती जाने वाली जरूरी सावधानियां
देवउठनी एकादशी के दिन ही कई क्षेत्रों में अथवा द्वादशी तिथि के दिन तुलसी-शालिग्राम विवाह रचाने की परंपरा निभाई जाती है। यदि आप एकादशी की शाम को ही तुलसी विवाह संपन्न करा रहे हैं, तो पंचांग देखकर भद्रा के समाप्त होने के बाद प्रदोष काल का चयन करें। माता तुलसी को लाल चुनरी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां और संपूर्ण सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है, जबकि भगवान शालिग्राम को पीला पीतांबर और पीले पुष्प चढ़ाए जाते हैं। दोनों के मध्य गठबंधन बांधकर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ सात फेरे कराए जाते हैं। एकादशी के दिन चावल का सेवन पूरी तरह वर्जित रहता है, इसलिए पूजा में अक्षत के स्थान पर सफेद तिल का प्रयोग करना शास्त्रसम्मत माना गया है। तुलसी के पत्ते एकादशी के दिन भूलकर भी नहीं तोड़ने चाहिए; पूजा के लिए एक दिन पूर्व ही पत्ते तोड़कर रख लेना चाहिए। इन नियमों का पालन करने से भद्रा का कोई दोष नहीं लगता और घर में अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि और आरोग्य का वास होता है।